योर ऑनर,

जब डॉक्टर्स 24 घंटे बिना छुट्टियों के पूरे साल काम कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं।

जिस देश मे मी लॉर्ड्स साल में 3 महीने छुट्टियां लेकर आराम फरमाएंगे उस देश मे अयोध्या जैसे संवेदनशील मामलों का 70 सालों में भी फैसला न आना समझ आता है।

कभी सोचा जब तुम लोग छुट्टियां लेकर कभी गोआ और कभी मनाली में ऐश कर रहे होते हो , तुम्हारी इस ऐश की वजह से लाखो लोग वक़्त पर जमानत न मिलने से अकारण जेलों में सड रहे होते हैं।

कहते हैं अदालतों में judges की कमी है।

किसने रोका है ज्यादा judges की भर्ती से?

डॉक्टर्स की कमी लगी तो झट से ब्रिज कोर्स का नुस्खा दे दिया।

अपने यंहा judges की कमी दूर करने की तो कभी फिक्र नही हुई।

कैसा हो यदि सारे पटवारियों को ब्रिज कोर्स करवा के फटाफट जज बना दिया जाए?

हो सकता है वो अयोध्या विवाद न सुलझा पाए पर छोटे मोटे मामलों के लिए तो लोगो को 20-20 साल अदालतों में नही जूझना पड़ेगा।कभी देखा

हम डॉक्टर्स कैसे ओवर टाइम करते हैं,नाईट ड्यूटी करते है।

तुम भी करो।

तुम भी कभी कड़ाके की सर्दी वाली रात में हिंदुस्तान के भीड़ तंत्र का सामना करो।

तुम भी कभी महसूस करो उस डर को जिसके साये में हिंदुस्तान के डॉक्टर्स रात दिन बिना रुके,बिना थके काम करते हैं।

स्वास्थ्य की तरह न्याय भी तो एक मूलभूत अधिकार है।

एक आम डॉक्टर दिन में यदि 50 मरीजों से फीस लेता है तो 4-5मरीज़ फ्री भी देखता है।

साल में 1-2 फ्री कैम्प भी लगा लेता है।

कभी सुना किसी वकील को मुफ्त में सलाह देते हुए?

किसी जज को छुट्टियों में काम करते हुए

फ्री कैम्प्स का तो ख्याल ही दूर की बात है।किसी एक रात मी लार्ड की अदालत गलती से खुल गई,वो भी एक दुर्दांत आतंकी के लिए तो वो मीडिया की सुर्खियां बन गई।

फिर ये ही वकील,ये ही जज अदालतों में डॉक्टर्स पर तंज कसते हैं,भारी भरकम जुर्माने लगाते हैं।

डॉक्टर हड़ताल करें तो रेस्मा लगाते हैं।

डॉक्टर्स की पिटाई हो तो नौकरी छोड़ने की सलाह देते हैं।

खुद को मलाईदार केस ने मिले तो झट से प्रेस कांफ्रेंस कर डाली ।

डूब मरो चुल्लू भर पानी मे।

एक हम डॉक्टर्स हैं जिन्होंने अपनी काबिलियत और परिश्रम से हिंदुस्तान को Medical Tourism का हब बना दिया।

एक तुम हो जिनकी अकर्मण्यता और भ्रष्ट आचरण की वजह से सारी दुनिया मे हिंदुस्तान की जग हँसाई हो रही है।

धिक्कार है ऐसे मी लोर्डस पर और धिक्कार है ऐसी न्याय व्यवस्था पर!
SHAME ON JUDICIARY

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