फिल्म गैसलाइट १९४४

हॉलीवुड फिल्म गैसलाइट १९४४ की एक रोमांचक थ्रिलर फिल्म थी | फिल्म का कथानक कुछ ऐसा है कि शुरुआत में ही एक धनाढ्य महिला का खून कुछ कीमती हीरे जवाहरातों के लिए हो जाता है | महिला की चौदह वर्षीय भतीजी पौला शोर मचाती है और चोर बिना उन कीमती जवाहरातों के भाग जाता है | कुछ साल बाद पौला शादी कर लेती है और उसी घर में रहने आती है जो उसकी आंटी ने उसके लिए छोड़ा था |

अब पौला के साथ अजीब अजीब घटनाएं घटनी शुरू हो जाती हैं | कभी उसका कोई नेकलेस गायब हो जाता है जिसकी वह शिकायत अपने पति ग्रेगरी से करती है, और वह नेकलेस पौला के पास से ही मिलता है | कभी कोई तस्वीर दीवार से गायब हो जाती है जिसकी शिकायत करने पर उसका पति कहता है कि खुद पौला ने ही वह तस्वीर हटाई थी | कभी उसे ऊपरी मंजिल से क़दमों की आवाज़ आती है तो कभी सीढ़ियों में “गैसलाइट” का अपने आप धीमा या तेज़ होना दिखाई देता है जिसे ग्रेगरी पौला का पागलपन कहता है | अंत में कुछ नाटकीय मोड़ों के बाद पता चलता है कि ग्रेगरी घर के कुछ नौकरों की मदद से पौला को पागल साबित करने पर तुला था | ग्रेगरी वही है जिसने उन कीमती आभूषणों और रत्नों के लिए पौला की आंटी का खून किया था |

अपनी तरह की पहली फिल्म होने के कारण यह फिल्म मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक उदाहरण बनी | पीड़ित के आस पास ऐसा वातावरण बनाना कि वह खुद अपनी इन्द्रियों पर ही विश्वास ना करे | यहाँ तक कि पीड़ित खुद को ही पागल समझने लगे, इस तकनीक को मनोविज्ञान के क्षेत्र में “गैसलाइटिंग” कहा जाता है |

वामपंथियों द्वारा इस तकनीक का बहुतायत में उपयोग किया गया है | भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग (जिसे आज कल छद्म सेक्युलर कहा जाता है) को आज वामपंथी यह यकीन दिलाने में सफल हुए हैं कि जो भी समस्या है वह हिन्दुओं द्वारा प्रदत्त है, बल्कि हिंदुत्व ही सारी समस्याओं की जड़ है | जब भी किसी लिबरल सेक्युलर हिन्दू के मन में आता कि इस्लामी आतंकवाद में कोई समस्या है तो फिर बाबरी मस्जिद के नाम पर कभी २००२ दंगों के नाम पर उनके मन में यह संदेह उत्पन्न करने की कोशिश की जाती कि “नहीं हम में ही कुछ ना कुछ खोट है” | इस गैसलाइटिंग की दिशा में हिन्दू आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार हुई साध्वी और कर्नल पुरोहित एक बड़ा कदम था | २६/११ हमले की कुछ तस्वीरें गौर से देखिएगा, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर कसाब की बन्दूक पकडे जो तस्वीर है, उसके हाथ पर उसमे कलावा बंधा है | यदि कसाब ना पकड़ा जाता तो हिन्दुओं की गैसलाइटिंग में यह आखिरी कील होती कि इतना बड़ा हमला हिन्दू आतंकवाद साबित हो जाता | उधर अज़ीज़ बरनी तो पैरेलल में किताब लिख ही रहे थे “२६/११ आर एस एस की साज़िश” | उस किताब का विमोचन दिग्विजय सिंह के हाथों हुआ वहाँ महेश भट्ट भी मौजूद था |

दूसरी और यही वामपंथी #मी_टू के तथाकथित विक्टिम पर तो कभी कश्मीरी लड़कियों पर राष्ट्रवादियों के द्वारा गैसलाइटिंग के उपयोग का इलज़ाम लगाते हैं | समझ में फर्क देखिये कि जिस शब्द का अर्थ हमें ख़ास पता भी नहीं उस शब्द का दुरुपयोग ये वामपंथी हमारे विरुद्ध धड़ल्ले से करते हैं | कभी सर्च करिए टर्म “गैसलाइटिंग” – आपको कई ऐसे आर्टिकल मिलेंगे जिसमे दक्षिणपंथियों द्वारा या मोदी के द्वारा बेचारे गरीबों, या परिवार में महिलाओं या की गैसलाइटिंग की जाती है | हमारी और उनकी जानकारी का स्तर देखिये, कोई तुलना ही नहीं है | आज के युग में जानकारी ही बचाव है |

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