*एक डॉक्टर की व्यथा*

अपनी तकलीफ़ साझा कर रहा हूं, दो मिनट मेरी जगह ख़ुद को रखकर सोचिएगा।

आठ सालों से ग्रामीण क्षेत्र में अवस्थित एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में शिशु चिकित्सक की तरह काम कर रहा हूं। करीब दो-तीन सालों से बचे समय में निजी प्रैक्टिस भी कर रहा हूं। अपने क्लिनिक से भी भरती योग्य गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज में ही अडमिट करके इलाज़ करता हूं, क्योंकि यहां अपेक्षाकृत बेहतर इलाज़ एक औसत शहरी निजी अस्पताल की तुलना में आधे से एक-चौथाई कीमत पर उपलब्ध हो जाता है और आयुष्मान कार्ड धारकों के लिए भी अलग से मुफ़्त सुविधा है। अपना इनडोर खोला नहीं, क्योंकि न तो ज़्यादा पैसों का टारगेट रहा और न उतना सिरदर्द लेना चाहता हूं।

मुंबई से देश के शीर्ष अस्पतालों में गिने जानेवाले केईएम अस्पताल से पढ़कर जब मैं यहां आया था तो बेइंतहा काम करने का जुनून भी था और अगाध सेवा भावना भी थी, लिहाज़ा पूरे इलाके से आए गंभीर से गंभीर केसेज़ भरती करके इलाज़ करता था, दिन-रात एक करके सीमित संसाधनों में यथासंभव सस्ता उपचार देते हुए भी अनेक मरणासन्न बच्चे बचाए, अस्पताल प्रबंधन की ओर से भी यथासंभव सहयोग मिलता रहा। जब डाक्टर कम थे तो कभी-कभी महीनों २४×७ भी ऑन कॉल रहकर काम किया। दो-तीन बजे रात हो या तड़के पांच बजे, एक फोन आया और मैं विद्युत गति से पांच मिनट में इमरजेंसी में हाजिर। रिश्तेदारों को संक्षेप में काउंसल करके नर्सों के साथ मिलकर सेप्टिक शॉक में, सारे अंग फेल हुई हालत में, डीआइसी के कारण मुंह से खून फेंकते बच्चों को आइवी, ट्रैकियल ट्यूब, फोली कैथ डालना, वेंटिलेटर पर डालना, वेंटिलेटर खाली न हो तो टी-पीस और आक्सीजन या ऐंबुबैग पर रखना, अपने हाथों से शॉक के लिए फ्लुइड बोलस और आयनोट्रोप लगाना- दो-दो घंटे जूझते रहना, बार-बार हालात का जायज़ा लेना- बहुतेरे ऐसे बच्चे बचाए जिनके बचने की मुझे ख़ुद कोई उम्मीद नहीं होती। कितनी ही दुर्लभ बीमारियों को डायग्नोज़ किया, जिनका यहां इलाज़ नहीं उनको समय पर सही जगह भेजकर बचाने में मदद की।

पर धीरे-धीरे ऐसा क्या हुआ कि मन उचटने लगा और मैं डाक्टरी की बैटिंग के लिए सुरक्षित पिच ढूंढने लगा? हुआ यह कि गाहे-बगाहे मेरा पाला ऐसे घटिया लोगों से पड़ जाता जो उजड्ड, कुटिल और अत्यंत नीच प्रवृत्ति के होते हैं। बीस में एक भी ऐसा आदमी मिल जाए, तो कई दिनों तक मन खिन्न रहता है, जिसका सीधा असर हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। आख़िर क्यों आपके लिए हम अपना जीवन इस तरह नारकीय बनाएं? अगर आपको भी ऐसा आदमी मिले जिसके severe perinatal asphyxia से ग्रस्त कोमाटोज़ बच्चे को बचाने के लिए आप जान लड़ाए हुए हों, ख़ुद बीमार होने और तीन दिन से ठीक से न सोने के बावजूद रात के तीन बजे आकर गंभीर बच्चे का इलाज करें, शुरू में बचने के आसार कम होने की बात स्पष्ट बता दें, दूसरी जगह ले जाने का भी विकल्प खुले तौर पर बता दें और उसकी लिखित सहमति से इलाज़ करें, और जब बच्चा दस दिन आइसीयू में रहने के बाद कोमा से बाहर आए तो वह आदमी आपपर पैसे ठगने के लिए जबरन बच्चे को रखने का आरोप लगाए और तू-तड़ाक करे? वह भी तब जबकि उस अस्पताल का एनआईसीयू का दैनिक शुल्क मात्र चार सौ रुपए हो? और उस पैसे से भी आपका कोई लेना-देना न हो, क्योंकि आप एक वेतनभोगी कर्मचारी मात्र हों। जी हां, मैं झेल चुका हूं- २०१५ की घटना है। यह केवल एक उदाहरण है। ऐसा जब बार-बार होता रहा, तो धीरे-धीरे मैंने भी अपनी जान बचाने के लिए दोनों हाथ हवा में उठाकर रेफरल का रास्ता अख़्तियार कर लिया। कल को इस तरह के किसी गंभीर बच्चे को बचाने के मेरे ईमानदार प्रयास विफल होने और बच्चे को गंभीर करके लानेवाले अभिभावकों की अपूरणीय आशाओं को न पूरा कर पाने पर यदि कोई मेरी हत्या कर दे (जैसे उत्तराखंड में डा. सुनील सिंह को ओपीडी में गोली मार दी, डा. सुशील पाल को कलकत्ते में २००४ में निर्दयतापूर्वक १५ लोगों ने चाकुओं से गोदकर और पत्थरों से कुचलकर मारा एक अवैध गर्भपात के लिए मना करने पर, चेन्नई में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ का गला ही काट दिया), तो मेरे बच्चे को कौन देखेगा? अब तो डॉक्टर के बीवी-बच्चों का भी मर्डर करने लगे मरीज़, वह भी लाइलाज़ बीमारी ठीक न कर पाने पर (जैसे इसी ६ जून को इंदौर में हुआ)! हालत तो यह है कि कोई-कोई तो रेफ़र करने पर भी झगड़ पड़ता है। कभी-कभी लगता है, इससे बेहतर मैं भी गैंगस्टर ही बनता, कम से कम यह सब तो नहीं झेलना पड़ता!

हमारा पेशा कितना कठिन है, इसकी एक और झलक आपको देता हूं। हर रोज़ कितने ही मृत मरीज़ों के परिजनों का क्रंदन हमें सुनना पड़ता है, दूसरे विभागों के मरीज़ों के भी। उससे क्या हमारा मन दु:खी नहीं होता? बिल्कुल होता है, पर हम अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए जबरन इन भावनाओं को मन के तहखाने में दबाए जाते हैं, सामने से चट्टान बने रहते हैं ताकि आपका इलाज़ करने में हमारे हाथ न कांपें, हमारे निर्णय ग़लत न हों। आपलोगों की हर बात को शक की निगाह से देखने, हर चीज़ में आरोप लगाने, झगड़ा करने और केस-मुकदमे करने की प्रवृत्ति के डर से मानवीय संवेदना तक व्यक्त करने में डर लगता है। हालत यह है कि जहां संसाधन और पैसे हैं, वहां अब मरीज़ के अभिभावकों से भरती से लेकर छुट्टी तक की जाने वाली काउंसलिंग का हर सेशन, हर बात कैमरे पर रिकॉर्ड की जा रही है, ताकि कल को आप अपनी बात से जब मुकर जाते हैं तो हमारे पास सुबूत रहें। यहां तक कि अगर मैं जो पहले केवल आशान्वित करने और ढाढस बंधाने की गरज़ से बोल देता था, “ईश्वर पर भरोसा रखें, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, आपका बच्चा अच्छा हो जाएगा।” तो अगले दिन अगर गंभीर बच्चे की हालत बिगड़ी या वह बच न सका, तो तुरंत ठगी का आरोप लेकर सब चढ़ जाते कि आपने तो बोला था कि ठीक हो जाएगा, क्यों नहीं ठीक हुआ, आपने धोखाधड़ी की है! यानी मानवीय संवेदना तक जताना डाक्टर के लिए जान पर भारी हो सकता है! उसपर तुर्रा यह कि पब्लिक और प्रेस वाले हमपर संवेदनहीनता का आरोप भी चस्पा करते हैं, मतलब चित भी आपकी और पट भी! एक बार यह कड़वा अनुभव होने के बाद कोई चिकित्सक आपको क्यों पाजिटिव प्रोग्नोसिस देगा महाराज? हमें पिटने और जलील होने का शौक़ है क्या?

समय के साथ यह सारा मानसिक तनाव हमें भी बहुत नुकसान पहुंचाता है- डाक्टरों में उच्च रक्तचाप, डायबिटीज़, अनिद्रा, डिप्रेशन और हृदय रोग का प्रतिशत पता कीजिएगा कभी। यह पेशा आज इस पेशे को अपनाने वालों के लिए गले का फंदा बनकर रह गया है केवल। आनेवाले समय में मेधावी लोग इस पेशे को पूरी तरह त्याग देंगे।

अपने और अपने डॉक्टर के मध्य अविश्वास और हिंसा की यह खाई मत खोदिए। यक़ीन मानिए, इस अंधी खाई में हम दोनों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ मौत का काला अंधेरा है।

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