कोरोना से मुलाकात

मेरे कुछ मित्रों ने मेरे कोरोना से टकराव का व्यक्तिगत अनुभव साझा करने को कहा। सोमवार से अपने मरीजों के बीच लौट रहा हूँ , उसके बाद शायद इतना लिखने का मौका न मिल पाए इसलिए अभी साझा कर रहा हूँ। मैं अपने मरीजों के सब्र और उनके मुझमे असीम विश्वास का कायल हूँ जो हफ़्तों महीनों मेरे लौटने का इंतज़ार कर सकते हैं 🙏🙏

कोरोना हर व्यक्ति के लिए एक अलग बीमारी हो सकती है, सिर दर्द से लेकर मृत्यु तक कुछ भी। मेरे लिए ये बदन दर्द, बुखार खाँसी व एक गरीब सा न्यूमोनिया था। बचपन से लेकर अब तक दसियों बार बुखार हुआ होगा लेकिन ये अलग था। शारीरिक तौर पर नहीं मानसिक तौर पर। क्योंकि इसके पीछे पिछले छह महीने की अखबार की सुर्खियां थी, वरडोमीटर का डेटा था और मेरी खुद की लिखी हुई दसियों फेसबुक की पोस्टें। जब रिपोर्ट पॉजिटिव आयी तो लगा कि कैसे वुहान से चली खबर कुछ महीनों में मेरे घर पहुंच गई। जब कोरोना में बुखार आता है तो आपका दिमाग खुद ही चित्रगुप्त की तरह हिसाब खोल लेता है और जब बुखार उतरते हुए पसीना आता है तो लगता है मानो बुरे कर्म पिघल के निकल रहे हों और शुद्दीकरण हो रहा हो। दिमाग आध्यात्मिकता और भौतिकता के बीच चक्कर खाता रहता है। कभी ईश्वर याद आता है तो कभी आपकी जीवन बीमा पालिसी।

सी टी स्कैन के लिए ले जाया गया। हमेशा रिपोर्ट ही पढ़ी थी कभी कराया नही था। रोचक लगा यह देख कर की आजकल सी टी स्कैन करते समय सांस रोकने के लिए कोई कर्मचारी नही कहता मशीन खुद कहती है। मैंने कायदे से उसकी बात मानी। मेरे रेडियोलाजिस्ट ने मेरे न्यूमोनिया को पास होने लायक 33% भी नंबर नही दिए पर निर्णय यही लिया गया कि मैं भर्ती हो जाऊं।

मेरे अस्पताल प्रशासन ने मेरे लिए बेहद अच्छी व्यवस्था की, मेरे पास शब्द नही है धन्यवाद के। जो सिस्टर सुबह की ड्यूटी में और जो रात की ड्यूटी में पी पी ई किट पहन कर आती थीं मैं उनका चेहरा भी कभी पहचान नही पाऊंगा, पर मास्क और शील्ड में से छलकती उनकी मुस्कान को मैं कभी भुला भी नहीं पाऊंगा। उस तरह की स्थिति में काम करना रोजी रोटी का सवाल तो हो ही नही सकता उसके तो और भी तरीके है, कोरोना की ड्यूटी तो सेवा भाव के अतिरिक्त और कुछ हो ही नही सकती। भर्ती होते ही मैं भूल गया की मैं खुद चिकित्सक हूँ। पूरी जिम्मेदारी हमारी जिम्मेदार टीम पर छोड़ दी और इंटरनेट पर कोरोना का ट्रीटमेंट नही पढ़ने की कसम खा ली।

दवा लगने का समय आया। दवा का नाम था Ramdesivir। मुझे गुरबाणी का शबद याद आ गया ” रामदास सरोवर नाते सब उतरे पाप कमाते”। गुरु रामदास सिक्खों के चौथे गुरु थे जिन्होंने अमृतसर को बसाया था। दवा ने काम भी किया और मैं बेहतर महसूस करने लगा।

अस्पताल का कमरा पांचवीं मंजिल पर था वहां से नजारा अच्छा था, मैंने महसूस किया कि पिछले दस साल में तरक्की सिर्फ मेरी ही नही हुई है शहर भी कहाँ से कहाँ पहुंच गया है। तरतीब या बेतरतीब पर तरक्की तो नजर आती ही है।

कोरोना और हमारी इम्युनिटी की लड़ाई रोचक होती है। परिणाम 99% इम्युनिटी के पक्ष में जा रहे हैं पर जिसके लिए घातक हुए उसके लिए जान लेवा हो सकते हैं। रोज अलग महसूस होता है किसी दिन कोरोना भारी दिखाई देता है किसी दिन आपकी इम्युनिटी। इच्छा शक्ति एवं विल पावर बहुत बड़ा रोल अदा करती है इसलिए कोई आपकी हौसला अफजाई के लिए कम से कम फ़ोन पर उपलब्ध होना बहुत जरूरी है। यहीं आपके परिवार का व दोस्तों का योगदान रहता है।

जब कोरोना ने मेरे किराये के मकान को खाली करना शुरू किया तो मुझे अहसास होने लगा। मुह का स्वाद ठीक हुआ फिर भूख लगी। गले का दर्द ठीक हुआ व सांस खुल कर आने लगी। ये ऑक्सिमेटर जब कुछ दिन आपसे परिचित होने लगता है तो शरारती हो जाता है, आपके मजे लेने लगता है हमेशा 92 से शुरू करके फिर 96 दिखाता है इसलिए इसको लगाते ही संयम न खोएं।

खैर ये बातें तो वो हुई जो मैंने एक आम मरीज की तरह अनुभव के नाते बताई। सार यह है कि ये आखिरी वायरस नही है, आज कोरोना है कल कोई और होगा।वायरस के संक्रमण को रोकना कठिन है। वायरस की रोकथाम के उपाय कैसे पूरे विश्व मे फेल हुए और बात व्यक्तिगत जागरूकता, इम्युनिटी और भाग्य पर आ टिकी। अभी एक नई टर्म पढ़ी syndamic। ये बीमारियां हमारे साथ रहने वाली हैं। इंसानों को एक नस्ल के तौर पर और मजबूत होना पड़ेगा, अपने आप को स्वस्थ रखने के अलावा कोई और चारा नही है। बी पी , शुगर और हार्ट की बिमारियो का जम कर मुकाबला करना होगा ताकि कोरोना का बेटा या पौता इंसानी नस्ल का इतना नुकसान न कर सके।

आप सबकी शुभकनाओं एवं इसको पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🙏

डॉ जितेन्द्र मक्कड़

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