आत्महत्या और मानसिकता

आत्महत्या और मानसिकता

आत्महत्या एक बहुत ही जटिल और अद्भुत प्रक्रिया है। अनादि काल से, इस विषय ने दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, कलाकारों और चिकित्सकों का ध्यान आकर्षित किया है, जो इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। आत्महत्या को लेकर कई भ्रांतियां हैं। तथ्य यह हैं कि इस विषय पर अभी भी कोई विशेष जानकारी नहीं हैं । लेकिन मनोविज्ञानियों ने इस पर बहुत काम किया है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस विषय पर गहराई से सोचा है। यह एक बड़ा और ज्वलंत सामाजिक मुद्दा हैं। आत्महत्या को रोकना उतना आसान नहीं हैं जितना यह लगता है। इसमें बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी की आवश्यकता होती है, और यह सोचना महत्वपूर्ण हैं कि इसका अधिकतम सामुदायिक लाभ कैसे उठाया जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में हर साल दस लाख से अधिक आत्महत्याएं होती हैं। यह दस प्रमुख कारण शीर्षकों में प्रमुख है और 15 से 35 वर्ष की आयु के लोगों में मृत्यु का तीसरा प्रमुख कारण है। एक व्यक्ति की आत्महत्या कम से कम छह लोगों को प्रभावित करती है।
आत्महत्या की घटना बहुआयामी और अत्यंत जटिल है। इसके कारण मानसिक, जैविक और आसपास की स्थितियों में छिपे होते हैं। यह पाया गया है कि 40 से 60 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या करने से पहले एक महीने के भीतर किसी डॉक्टर से संपर्क किया था। लेकिन मनोचिकित्सक के संपर्क में आने की दर बहुत कम है। ज्यादातर डॉक्टर मरीज के आत्महत्या के विचार को गंभीरता से नहीं लेते। आत्महत्या से काफी हद तक बचा जा सकता है, अगर मरीज के पहले संपर्क में आने वाला फैमिली डॉक्टर इन विचारों को गंभीरता से लेता हैं। मानसिक रोगों में अवसाद आत्महत्या का प्रमुख कारण हैं। डिप्रेशन के मरीजों में आत्महत्या करने की 15 प्रतिशत संभावना होती हैं। स्किज़ोफ्रेनिया और शराब आत्महत्या के अन्य प्रमुख कारण हैं। यह भी पाया गया हैं कि आत्महत्या करने वाले ज्यादातर लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से पहले ही आत्महत्या कर लेते हैं। यदि बाकी डॉक्टरों में आत्महत्या के बारे में जागरूकता पैदा की जाए तो जल्द से जल्द मनोचिकित्सक की सेवाएं लेने से आत्महत्या को रोका जा सकता हैं। लेकिन अन्य डॉक्टर अक्सर मरीज को मनोचिकित्सक के पास भेजने से हिचकिचाते हैं क्योंकि रुग्ण मनोचिकित्सक के पास जाने में हीनता महसूस करते हैं या बहुत शर्मिंदा होते हैं। हमारे समाज में एक गलत धारणा है कि पागल लोग ही मनोचिकित्सक के पास जाते हैं। अवसाद कई प्रकार के होते हैं जैसे द्विध्रुवी अवसाद,(Bipolar Depression ) एकध्रुवीय अवसाद,( Unipolar Depression ) प्रसवोत्तर अवसाद (Postpartum Depression ) और बहुत कुछ। प्रसव के कुछ महीनों बाद हम अखबार में मां के अकेले आत्महत्या करने या बच्चे के साथ आत्महत्या करने की खबरें पढ़ते हैं।
कुछ लोगों का मूड बहुत ही परिवर्तनशील होता है। कई लोग कुछ दिन या कुछ महिनों के लिए अच्छा महसूस करते हैं, और कुछ हफ्तों या कुछ दिनों के लिए बहुत उदास महसूस करते हैं, हम सोचते हैं कि उन्हें साइक्लोथाइमिक विकार हो सकता हैं । डिप्रेशन के समय में आत्महत्या के बारे में सोचना आम बात है। और इसलिए सामान्य चिकित्सकों के लिए मानसिक बीमारी के बारे में जानकारी रहना बहुत जरूरी है। अधिकांश समय सामान्य चिकित्सक इस बात पर ध्यान नहीं देता कि रोगी को अवसाद है क्योंकि इन रोगियों के लक्षण मानसिक नहीं बल्कि शारीरिक होते हैं। शारीरिक लक्षण जैसे सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ, अंगों में दर्द, कमजोरी, शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द , निंद की तकलिफ आदि और अंत में लाक्षणिक इलाज किया जाता है।
डिप्रेशन को अवसाद के रूप में परिभाषित किया गया है। यह महसूस करना कि हमारे पास भावनात्मक रूप से ‘रन डाऊन जैस’ है। हालांकि, अगर व्यक्ति तीन सप्ताह के बाद भी उदास रहता है, तो व्यक्ति को डिप्रेशन की बिमारि होने की संभावना अधिक होती है। अवसाद के लक्षणों में मितली महसूस करने की बढ़ती प्रवृत्ति, मद्य लेने या अन्य नशिले पदार्थ का सेवन करने की प्रवृत्ती बढना , कुछ चेकअप और दवा के लिए डॉक्टर के पास बार-बार जाना शामिल है। ऐसे लोग रात को सो तो जाते हैं लेकिन सुबह जल्दी २ या ३ बजेही निंद खुल जाती है ओर अत्यंत उदासी और घबराहट महसुस करते हैं । जीवन में कुछ भी वास्तविक नहीं लगता।जीवन निरस और अंधक्कारमय लगता हैं। भूख कम लगना या बढ़ना…. वजन कम होना या बढ़ना डिप्रेशन का संकेत हो सकते है। यदि अवसाद का शीघ्र निदान किया जाता है, तो वर्तमान में उपलब्ध दवाएं अत्यधिक प्रभावी हैं और कई आत्महत्याओं को रोक सकती हैं।

व्यक्तित्व विकार भी आत्महत्या का प्रमुख कारण है। उदाहरण के लिए, बाॅर्डर लाईन पर्सनालिटी डिसआॅर्डर , हिस्टेरिकल पर्सनालिटी डिसआॅर्डस् और असामाजिक व्यक्तित्व विकार वाले लोग दूसरों की तुलना में आत्महत्या करने की अधिक संभावना होती हैं। मानसिक बीमारी आत्महत्या का प्रमुख कारण है, जबकि 15% आत्महत्या असहनिय और बेकाबु परिस्थिती के वजह से होती हैं। बाकी बस समय की बात है। हर देश में, पुरुष महिलाओं की तुलना में अधिक सफल आत्महत्या करते हैं।अधिक से अधिक महिलाएं (८ महिलाएं आत्महत्या करने की कोशिश करती है और इस तुलना में १ पुरुष कोशिश करता हैं। लेकिन सफल आत्महत्या की दर पुरुषों की तुलना में महिलाओं बहुत कम है। इसका एकमात्र अपवाद चीन है, जिसमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सफल आत्महत्याओं की दर अधिक है। 15 से 30 वर्ष और 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में आत्महत्याएं सबसे अधिक प्रचलित हैं।
सफल आत्महत्याएं तलाकशुदा लोगों, विधवाओं या विधुरों में अधिक होती हैं। विवाहित पुरुषों में आत्महत्या की दर बहुत कम है। शादी महिलाओं को आत्महत्या के खिलाफ विशेष सुरक्षा नहीं देती है।
लेकिन व्यवसाय और आत्महत्या के बीच कुछ संबंध है। उदाहरण के लिए, पशु चिकित्सकों, फार्मासिस्टों, दंत चिकित्सकों, किसानों और डॉक्टरों की आत्महत्या दर अन्य पेशेवरों की तुलना में अधिक है। शायद प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के कारण, इन पेशेवरों में आत्महत्याएं अधिक प्रचलित हैं। बेरोजगारी भी आत्महत्या का एक प्रमुख कारण है।
हमारे समाज में आत्महत्या को लेकर कुछ भ्रांतियां हैं। उदाहरण के लिए, हम समझते हैं कि जो लोग कहते हैं कि वे आत्महत्या करेंगे, वे आमतौर पर आत्महत्या नहीं करते हैं। जो गरजते हैं वह बरसते नही ऐसा सोचकर इनको नजर अंदाज किया जाता हैं। आत्महत्या के विचार व्यक्त करने वाले व्यक्ति को समजने की आवश्यकता होती है , इससे विपरित उनका उपहास किया जाता है, ।आत्महत्या के बारे में सोचना भी उतना ही खतरनाक है। एक और गलत धारणा यह है कि किसी व्यक्ति के आत्मघाती विचारों के बारे में पूछने से आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, लेकिन यह एक गलती है। कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह पता लगाने के लिए कह सकता है कि क्या किसी व्यक्ति के मन में आत्महत्या के विचार हैं। क्या आपको जीवन कठिन लगता है? क्या आप इन दिनों उदास हैं, क्या आप अपना भविष्य अंधकारमय देखते हैं? क्या आपको लगता है कि जीवन एक बोझ है? क्या आपको लगता है कि जीवन जीने लायक नहीं है? ऐसे प्रश्न पूछने से व्यक्ति को कुछ आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। और उसे लगता हैं की उसकी दिक्कते समजने वाला कोई हैं। यदि कोई व्यक्ति मजाक में भी आत्महत्या करने के विचार व्यक्त करता है, तो उन विचारों को और उस व्यक्ति को गंभीरता से लेना चाहिए। तुरंत किसी काउंसलर या मनोचिकित्सक की सलाह लें। इस बात को बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। समाज को इसके प्रति जागरूक किया जाए तो कुछ हद तक आत्महत्याओं से बचा जा सकता है।
आत्महत्या करने के बारे में सोचने वाला हर कोई भ्रमित रहता है। इसे करें या न करें इसको लेकर लगातार दिमाग में मंथन होता रहता है। यदि इस मंथन को ठीक से हल होने दिया जाए तो कई आत्महत्याओं को रोका जा सकता है। कुछ आत्मघाती लोग आवेगपूर्ण कार्य करते हैं। ऐसे समय में अगर उन्हें थोड़ी सी भी मदद मिल जाए, तो व्यक्ति को लग सकता है कि वह जो निर्णय ले रहा है वह गलत है और आत्महत्या करने की इच्छा दूर हो सकती है। ऑनलाइन आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन थोड़ी मददगार हो सकती है। इस प्रकार की कुछ हेल्पलाइन आपके लिए उपलब्ध हैं। लेकिन इसके लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। कुछ लोग आत्महत्या करने के अपने फैसले को लेकर बहुत सावधान रहते हैं। ऐसे में, यदि उन्हें आत्महत्या का कोई अन्य विकल्प दिया जाता है, तो उस नये रास्ते पर जाने की संभावना अधिक हो जाती है। आत्महत्या रोकने में मीडिया की अहम भूमिका है। जिस तरह अखबार या टीवी में आत्महत्या की खबरें नमक मिर्च लगाकर आती हैं उसी तरह युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जब आत्महत्या रिपोर्ट करने की बात आती है तो मीडिया की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। मीडिया को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी तरह की आत्महत्या का महिमामंडन न हो। आत्महत्या की घटनाओं के प्रति संवेदनशील होने के बजाय, यदि ऐसी आत्महत्याओं को कैसे रोका जा सकता है और क्षेत्र में क्या सुविधाएं उपलब्ध हैं, इस बातों पर जादा जोर देना चाहिए ,तो मॉडलिंग की प्रवृत्ति कम हो जाएगी और मदद लेने की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
आत्महत्या को रोकना केवल चिकित्सा विज्ञान की बात नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों जैसे कि कृषक, राजनेता, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, पुलिस बल, सामाजिक स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक साथ आना और यह सोचना महत्वपूर्ण है कि हमारे समाज में क्या गलत है और इसके बारे में क्या किया जा सकता है। आत्महत्या शायद जीवन का सबसे बुरा अंत है। सभी के लिए एक साथ आना और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करना और सामाजिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के बारे में सोचना आवश्यक है।
जिन देशों में मनोचिकित्सकों की संख्या उनकी आबादी की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक है, वहां आत्महत्या की दर बहुत कम है। 135 करोड की विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश में केवल 9000 मनोचिकित्सक हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 33 करोड की आबादी के लिए 28,000 मनोचिकित्सक हैं। यह भारत में उच्च आत्महत्या दर के मुख्य कारणों में से एक है। अगर आपको या आपके किसी जानने वाले को इससे कोई समस्या है, तो “नुतन सुसाइड प्रतिरक्षा ऑनलाइन हेल्पलाइन ” से संपर्क करने में संकोच न करें। 82 75 70 81 40 तुरंत डायल करें

डॉ अविनाश जोशी
मनोचिकित्सक
नागपुर

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