उसनेकहाथा

उसनेकहाथा …

वे मेरी शुरुआती प्रैक्टिस के दिन थे। मेरा क्लिनिक बहुत छोटा सा था, इतना छोटा कि बड़े लोग आने में हज़ार बार हिचकें।
मगर उस दिन एक लम्बा गोरा और सुदर्शन पुरुष मेरे कमरे में आया। उसके गले में पड़ी सोने की मोटी ज़ंजीर और पर्फ़्यूम की अनोखी महक से उसकी हैसियत का पता चल रहा था।
मैंने तनिक अचरज से उसकी ओर देखा। उसने कहा – फ़लाँ दुकान का नाम तो आपने सुना ही होगा। मैं उसका मालिक हूँ। अपने छोटे भाई को दिखाने के लिए आया हूँ। बड़ा पुराना केस है। राँची जाकर बार-बार दिखाना सम्भव नहीं। फ़लाँ बाबू ने कहा है कि विनय जी नए मगर अच्छे डॉक्टर हैं। ख़ूब समय देकर देखेंगे। चिलाने बाबू की तरह नहीं कि .. मैंने रोकते हुए कहा – आप अपने भाई को बुला लीजिए।

साहिब का भाई भी साहिब के जैसा ही दिख।लम्बी बीमारी और Mood Stabilisers और Antipsychotics के कुप्रभाव से ग्रस्त। उनकी उम्मीद से अधिक समय दिया मैंने। साहिब के भाई को बाइपोलर मूड डिसॉर्डर था, और इन दिनों हल्के उन्माद में थे। यह उनकी किशोरावस्था में शुरू हुई थी और फ़ैमिली हिस्ट्री भी पॉज़िटिव थी। ये तो बीमार थे ही कोई बीस साल से। मैंने साहिब और मरीज़ की पत्नी को रोग और उसकी प्रोग्नोसिस के बारे में अच्छी तरह समझा दिया। कोई तीन साल तक सब कुछ ठीक चला। मगर एक दिन साहिब के भाई ने कहा – मैं अकेले में बात करना चाहता हूँ। उनकी पत्नी मुस्कुराकर बाहर चली गयीं। उन्होंने उठकर दरवाज़ा बंद किया और धीरे से बोले – डॉक्टर साहब मैं जीना नहीं चाहता। इस लम्बी बीमारी से ऊब गया हूँ।” मैंने कुछ कहना चाहा, मगर उन्होंने मुझे रोकते हुए जोड़ा – मेरे बचने की एक ही सूरत है..
-क्या ? बताएँ आप, मुझसे जो भी बन सकेगा, करूँगा।

  • आप मेरे बड़े भाई को कहिए कि वे मुझसे बात करें। जब मैं मेनिया में होता हूँ तो मैं उन्हें नहीं लगाता और जब डिप्रेशन में होता हूँ तो वे मुझे …जाने दीजिए, आप उनसे कहिए कि एक बार मुझसे बात करें।

मैंने उनसे उनके भाई का नम्बर माँगा और आश्वस्त किया कि मैं तुरत फ़ोन करूँगा। तहक़ीक़ात से पता चला – वे कोई दो महीने से लिथीयम नहीं ले रहे। पत्नी ने कहा – दवा ख़ुद खाते हैं। मुझे तो पता भी नहीं रहता।
बहरहाल, मैंने suicidal ideation को ध्यान में रखकर नुस्ख़ा तैयार कर दिया और उनकी पत्नी को अच्छी तरह समझा दिया कि सावधान रहना है। कम से कम दो सप्ताह तक। इन्हें अकेले नहीं छोड़ना है।

उन दोनों के जाने के तुरत बाद उनके बड़े भाई साहब को फ़ोन किया और उनसे गुज़ारिश की कि आप कृपया अपने भाई पर ध्यान दें। वे आपको कुछ कहना चाहते हैं।उन्हें ध्यान से सुनें और अतिरिक्त स्नेह दें। अभी वे थोड़े परेशान हैं। दो सप्ताह तक सावधानी और निरंतर निगरानी की ज़रूरत है। अगर आपलोग ये कर सकते हैं तो तो ठीक वरना हॉस्पिटल में भर्ती कराने और ECT दिलवाने के लिए आकर मिलें। …. उन्होंने ने मेरी बात तो सुन ली मगर उनकी आवाज़ में कोई concern नहीं महसूस हुआ। .. अगली सुबह फिर फ़ोन किया, मगर बात नहीं हुई।

इसके बाद हमारा सम्पर्क टूट गया था। लगभग साल भर बाद उनका स्टाफ़ आया और उनका कार्ड देकर बोला – साहब के छोटे भाई की पत्नी को दिखाना है। .. मैंने पूछा – उनके छोटे भाई कैसे हैं ?

  • जी ऊ त डेथ कर गए .. साल भर पहिले।
  • कैसे ?
  • छत से कूद गए थे ।

सुनकर दिमाग़ सुन्न, मगर प्रोफ़ेशनल तरीक़े से दुःख ज़ाहिर करने के बाद उनकी पत्नी को अंदर बुलवाया। पड़ताल की तो पाया कि साल भर से schizophrenia है और इन दिनों लगभग चुप।..

मुझे लगा था, वे शायद बता पाएँ कि उनके पति कब और कैसे मरे। बड़े भाई साहब ने बात की या नहीं। किससे पूछता और क्यों पूछता !

मैंने चुपचाप अपना कर्तव्य निभाया और उदास हो गया। dr vinay kumar

ऐसी अधूरी कहानियाँ जब किसी शाम की तनहाई में याद आती हैं तो दिल बहुत दुखता है। .. यह प्रसंग इसलिए साझा कर रहा कि संवाद और स्नेह की अहमियत पर चर्चा चलती रहे।

खुली_डायरी

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