आगरा का मेडिकल कॉलेज 171 साल पुराना हो चला है पहले यहां LMP और LSMF की डिग्री दी जाती थी और यहां से पढ़कर लोग दराज के गांव में सेवा के लिए या नौकरी के लिए जाया करते थे. अंग्रेजों ने मेडिकल कॉलेज से ट्रेड चिकित्सकों को पहले फौज की सेवा में लगाया गया( developed to serve English Army).
आज भी दूर दराज से गांव के लोग यहां पढ़ने आते हैं लेकिन अपने क्षेत्र में सेवा के लिए नहीं जाते.
आप मेडिकल के पहले वर्ष के छात्रों से पूछिए तो कुछ बताएंगे कि परिवार में अपनों का इलाज न करा पाने के लिए वह मेडिकल में आए ,बहुत लोग सेवा के लिए डॉक्टर बनने की बात करेंगे ,पर फाइनल ईयर आते-आते उनके स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है ऐसा क्यों होता है? क्या समाज की हालत और सिस्टम उन्हें कुछ और सोचने के लिए मजबूर कर देता है! कड़ी मेहनत से MBBS करने के बाद जब मुश्किल से NEET पीजी में सिलेक्शन होता है तो छात्र किस ब्रांच में जाए आजकल स्टूडेंट यह सोचकर चॉइस लेते हैं की किसमै सर्विस मिलना आसान है, अपनी रुचि की बात या ब्रांच मिलना लगभग असंभव हो गया है MD/MS करके अपना क्लीनिक खोलकर अपने घर clinic का किराया और अन्य जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत बहुत कम लोगों में बची है. सुपर स्पेशलिटी में जाना आजकल जैसे मजबूरी बन गया है क्योंकि जनता का रुझान बेसिक फिजिशियन से हटकर सुपर स्पेशलिस्ट से इलाज करने की चाहत ही है शायद इसीलिए इलाज भी महंगा होता जा रहा है. गांव देहात और शहर में भी 60-70% चिकित्सा आज भी झूला छाप unqualified के हाथ में है .
प्राइवेट कॉलेज से निकल डॉक्टर जो 2 से 5 करोड़ खर्च करके MS/Mch या एमडी/DM हासिल करके आते हैं उनके लिए भी एक ही विकल्प है एक कारपोरेट अस्पताल को ज्वॉइन करें या जो अपनी क्लीनिक चला रहे हैं उनको कई बड़े अस्पतालों में जाना आसपास के शहरों में जाना ताकि क्लीनिक पर मतलब भर के मरीज आ सके, एक बेहद मेहनत का और और मुश्किल आजीविका साधन हो गया है .छोटे क्लिनिक छोटे अस्पताल जहां अफॉर्डेबल हेल्थ केयर कम पैसों में बेहतर इलाज की सुविधा हुआ करती थी, चलना मुश्किल होता जा रहा है. कॉरपोरेट हॉस्पिटल चिकित्सक नहीं, MBA चलाते हैं, जहां चिकित्सा व्यवसाय है उनसे आप कम पैसों में कैसे इलाज करवा पाएंगे?. चिकित्सक होना गर्व की बात है पर आजकल चुनौती बड़ी है!
Happy doctor’s day… ईश्वर आपको चिकित्सक बनाए रखें !










