भारत में लिविंग विल (Living Will) को कानूनी मान्यता सुप्रीम कोर्ट के 9 मार्च 2018 के एक ऐतिहासिक फैसले के माध्यम से मिली, जिसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी दी गई। यह फैसला कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार मामले में आया, जिसमें कोर्ट ने माना कि व्यक्ति को गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा है। हालाँकि, लिविंग विल को लागू करने के कानूनी पहलू जटिल हैं और कई चुनौतियों से भरे हैं। नीचे इसके प्रमुख कानूनी पहलुओं का विवरण है:
1. लिविंग विल क्या है?
- लिविंग विल एक लिखित दस्तावेज है, जिसमें व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले चिकित्सा उपचार के बारे में अपनी इच्छाएँ व्यक्त करता है, खासकर तब जब वह गंभीर रूप से बीमार हो, कोमा में हो, या निर्णय लेने में असमर्थ हो।
- इसमें यह निर्दिष्ट किया जा सकता है कि व्यक्ति किन परिस्थितियों में जीवन-रक्षक उपचार (जैसे वेंटिलेटर, ट्यूब फीडिंग) नहीं चाहता।
2. कानूनी मान्यता और दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को मान्यता देते समय इसके लिए सख्त दिशा-निर्देश निर्धारित किए:
- लिखित रूप: लिविंग विल को लिखित रूप में होना चाहिए, और इसे नोटरी या गजटेड ऑफिसर द्वारा सत्यापित करवाना आवश्यक है।
- स्पष्टता: दस्तावेज में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन परिस्थितियों में उपचार बंद करना है। यह अस्पष्ट नहीं हो सकता।
- निर्णय लेने की क्षमता: लिविंग विल तभी बनाया जा सकता है, जब व्यक्ति मानसिक रूप से सक्षम हो और उसे अपनी इच्छा की पूरी समझ हो।
- जानकारी: व्यक्ति को चिकित्सा परिणामों और विकल्पों की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
- साक्षी: लिविंग विल पर कम से कम दो साक्षियों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- प्राधिकरण: लिविंग विल में एक निष्पादक (Executor) या अभिभावक (Guardian) नियुक्त किया जा सकता है, जो व्यक्ति की इच्छा को लागू करने की जिम्मेदारी लेता है।
3. लिविंग विल लागू करने की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को लागू करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया निर्धारित की:
- मेडिकल बोर्ड की मंजूरी: अगर व्यक्ति लिविंग विल के आधार पर उपचार बंद करना चाहता है, तो अस्पताल में एक प्राथमिक मेडिकल बोर्ड (अस्पताल के डॉक्टरों का) और फिर एक द्वितीयक मेडिकल बोर्ड (जिला मजिस्ट्रेट द्वारा नियुक्त) इसकी समीक्षा करता है। दोनों बोर्डों को यह सुनिश्चित करना होता है कि मरीज की स्थिति लाइलाज है और लिविंग विल की शर्तें लागू होती हैं।
- जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका: लिविंग विल को जिला मजिस्ट्रेट के पास जमा करना होता है, और उनकी मंजूरी के बाद ही इसे लागू किया जा सकता है।
- परिवार की सहमति: अगर परिवार या नजदीकी रिश्तेदार सहमत नहीं हैं, तो मामला और जटिल हो सकता है। कोर्ट ने परिवार की सहमति को अनिवार्य नहीं किया, लेकिन व्यवहार में यह महत्वपूर्ण हो जाता है।
- न्यायिक हस्तक्षेप: अगर कोई विवाद होता है, तो मामला हाई कोर्ट में जा सकता है, जो अंतिम निर्णय लेता है।
4. 2023 में संशोधन
जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल की प्रक्रिया को सरल करने के लिए कुछ संशोधन किए, क्योंकि 2018 के दिशा-निर्देशों को लागू करना जटिल पाया गया:
- मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया को सरल किया गया: अब प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया को तेज करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई है।
- नोटरीकरण की अनिवार्यता कम की गई: पहले नोटरीकरण अनिवार्य था, लेकिन अब इसे आसान बनाया गया है, ताकि अधिक लोग लिविंग विल बना सकें।
- जागरूकता और संरक्षण: कोर्ट ने सरकार से कहा कि लिविंग विल के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए और इसे संरक्षित करने के लिए एक डिजिटल रजिस्ट्री बनाई जाए।
5. कानूनी चुनौतियाँ
- जटिल प्रक्रिया: भले ही 2023 में संशोधन हुए हों, मेडिकल बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी की प्रक्रिया अभी भी समय लेने वाली और जटिल है। आपातकालीन स्थिति में इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है।
- कानूनी जवाबदेही का डर: डॉक्टर और अस्पताल अक्सर लिविंग विल को लागू करने से हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि परिवार या अन्य लोग उन पर गलत इलाज या लापरवाही का आरोप लगा सकते हैं।
- परिवार का विरोध: लिविंग विल के बावजूद, अगर परिवार उपचार जारी रखना चाहता है, तो डॉक्टर और अस्पताल परिवार की बात मानने को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि यह कानूनी और सामाजिक रूप से कम जोखिम भरा होता है।
- जागरूकता की कमी: आम जनता और यहाँ तक कि कई डॉक्टरों को लिविंग विल की कानूनी प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह और भी कम समझा जाता है।
- सांस्कृतिक टकराव: भारत में मृत्यु और जीवन-रक्षक उपचार को लेकर सांस्कृतिक और धार्मिक विश्वास लिविंग विल को लागू करने में बाधा बनते हैं। कई लोग इसे “जीवन छोड़ने” के रूप में देखते हैं।
6. कानूनी स्थिति की तुलना
- अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: कई देशों (जैसे अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया) में लिविंग विल को लागू करना भारत की तुलना में आसान है। वहाँ मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया कम जटिल है, और मरीज की इच्छा को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में अभी यह प्रक्रिया बहुत नौकरशाही-प्रधान है।
- सक्रिय इच्छामृत्यु का अभाव: भारत में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु (उपचार बंद करना) को मंजूरी है। सक्रिय इच्छामृत्यु (जैसे इंजेक्शन द्वारा मृत्यु देना) अभी भी गैरकानूनी है, जो कुछ मामलों में मरीजों और परिवारों के लिए असमंजस पैदा करता है।
7. लिविंग विल बनाने की प्रक्रिया
- लिखित दस्तावेज: व्यक्ति को अपनी इच्छाएँ स्पष्ट रूप से लिखनी होंगी, जैसे कि किन परिस्थितियों में उपचार बंद करना है (उदाहरण: स्थायी कोमा, लाइलाज बीमारी)।
- साक्षी और सत्यापन: दो साक्षियों और नोटरी/गजटेड ऑफिसर का सत्यापन जरूरी है।
- जमा करना: दस्तावेज को जिला मजिस्ट्रेट के पास जमा करना होता है।
- परिवार को सूचित करना: परिवार और डॉक्टरों को लिविंग विल की जानकारी देना महत्वपूर्ण है, ताकि समय आने पर इसे लागू किया जा सके।
8. वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य
- जागरूकता की कमी: अधिकांश लोग लिविंग विल के बारे में नहीं जानते, और इसे बनाने की प्रक्रिया को जटिल मानते हैं।
- अस्पतालों की अनिच्छा: निजी अस्पताल, जो ICU और अन्य उपचारों से लाभ कमाते हैं, लिविंग विल को लागू करने में कम रुचि दिखाते हैं।
- कानूनी सुधार की जरूरत: प्रक्रिया को और सरल करने, डिजिटल रजिस्ट्री बनाने, और डॉक्टरों को कानूनी सुरक्षा देने की जरूरत है।
- सामाजिक स्वीकृति: मृत्यु को गरिमापूर्ण और स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करने के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक मानसिकता में बदलाव जरूरी है।
निष्कर्ष
लिविंग विल भारत में कानूनी रूप से मान्य है, लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल और नौकरशाही से भरी है। सुप्रीम कोर्ट के 2018 और 2023 के फैसलों ने इसे लागू करने का रास्ता खोला, लेकिन जागरूकता की कमी, सामाजिक दबाव, और चिकित्सा प्रणाली की व्यावसायिक प्रकृति इसे व्यवहार में लाना मुश्किल बनाती है। भविष्य में, अगर प्रक्रिया को और सरल किया जाए, जागरूकता बढ़ाई जाए, और पालिएटिव केयर को बढ़ावा दिया जाए, तो लिविंग विल अधिक स्वीकार्य और व्यावहारिक हो सकता है। यह न केवल मरीज की गरिमा को बनाए रखेगा, बल्कि परिवारों पर आर्थिक और भावनात्मक बोझ को भी कम करेगा।










