तमिलनाडु का खौफनाक आईना: डॉक्टरों की बेरोजगारी की मार से सिसकता राजस्थान, अब जागो या फिर सब तबाह!जयपुर.

कल्पना कीजिए, एक ऐसा सपना जो बचपन से ही आंखों में चमकता है—सफेद चादर में लिपटा एक डॉक्टर, जो जिंदगियां बचाता है, सम्मान पाता है। लेकिन तमिलनाडु की सड़कों पर आज वही डॉक्टर स्विगी के पार्सल पहुंचा रहा है, ओला की टैक्सी चला रहा है। मात्र 25,000 रुपये मासिक वेतन पर गुजारा कर रहा है वह, जो कभी लाखों की डिग्री के हकदार थे। सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टर, जिन्होंने सालों की कठिन तपस्या की, आज बेरोजगार घूम रहे हैं—उनकी विशेषज्ञता बेकार की धूल चाट रही है। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील राज्य की हृदयविदारक हकीकत है। और यह हकीकत अब राजस्थान की देहरी पर दस्तक दे रही है, जहां गरीबी की छाया में भी मेडिकल कॉलेजों की बाढ़ आ रही है। अगर नीति-निर्माताओं ने अभी नहीं सुधरा, तो हमारा स्वास्थ्य तंत्र तमिलनाडु से भी तेजी से ढह जाएगा। यह चेतावनी नहीं, एक करुणाजनक चीख है—सुन लो, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
तमिलनाडु: जहां ‘डॉक्टर बनना’ अब अभिशाप बन गया
तमिलनाडु, जो हमेशा स्वास्थ्य सेवाओं का मॉडल राज्य रहा, आज डॉक्टरों के लिए नर्क का पर्याय बन चुका है। यहां डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:495 है—यानी हर डॉक्टर पर 495 मरीजों का बोझ। 0 विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिश मात्र 1:1000 है, लेकिन तमिलनाडु में डॉक्टरों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि ओवर-सप्लाई ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया। परिणाम? बेरोजगारी का भयानक तूफान।
फ्रेश एमबीबीएस डॉक्टर निजी अस्पतालों में औसतन 25,000 से 40,000 रुपये मासिक कमाते हैं—यह वेतन उस 6-7 साल की कठोर पढ़ाई और करोड़ों के निवेश (प्राइवेट कोटा सीटों के लिए) का मजाक उड़ाता है। 5 दंत चिकित्सक (डेंटिस्ट) तो और भी बदतर हाल में हैं। राज्य में डेंटिस्ट-जनसंख्या अनुपात 1:3,667 है, और 97% से अधिक डेंटिस्ट निजी प्रैक्टिस या बेरोजगारी की चक्की में पिस रहे हैं। 29 महज 5% ही सरकारी नौकरियों में हैं, बाकी या तो स्विगी-ओला जैसे गिग इकोनॉमी में मजदूरी कर रहे हैं या बेरोजगार घूम रहे। 25 सुपर-स्पेशलिस्ट? वे तो बिल्कुल किनारे पर हैं—रोजगार की तलाश में शहर-से-शहर भटक रहे, उनकी डिग्री बेकार कागज का टुकड़ा बन चुकी। यह स्थिति इतनी विडंबनापूर्ण है कि एक प्रगतिशील राज्य, जहां स्वास्थ्य बजट देश के औसत से ऊपर है, आज डॉक्टरों को ‘पतन’ की खाई में धकेल रहा। क्या यह विकास है? नहीं, यह एक सामाजिक अपराध है, जो हजारों परिवारों के सपनों को कुचल रहा।
राजस्थान: गरीबी की मार में भी ‘संख्या का जाल’, बुनियादी ढांचा चरमराया
राजस्थान, जो स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के लिए हमेशा संघर्ष करता नजर आता रहा, अब उसी त्रुटिपूर्ण राह पर सरपट दौड़ रहा। यहां मेडिकल कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ रही—2025-26 सत्र के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने राजस्थान में नई सीटें और कॉलेजों को मंजूरी दी है, जिसमें 9,075 अतिरिक्त एमबीबीएस सीटें शामिल हैं। 16 राज्य में कुल 34 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, और 50 नई सीटें टोंक जैसे क्षेत्रों में जोड़ी गईं। 18 लेकिन यह विस्तार किस कदर खतरनाक है? 89% मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है—प्रयोगशालाएं अपर्याप्त, क्लीनिकल केस लोड नगण्य, और फैकल्टी की भारी कमी। 32
अजमेर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में तो शव संरक्षण टैंक लीक हो रहे हैं, जिससे विषैली धुएं का जहर फैल रहा। 31 नए कॉलेज खुल रहे हैं, लेकिन अस्पताल बेड, विशेषज्ञ फैकल्टी और शोध सुविधाएं नदारद। राजस्थान मेडिकल काउंसिल, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया और केंद्र सरकार—ये संस्थाएं किस प्रभाव में मंजूरियां दे रही? यह सवाल अनुत्तरित है, लेकिन परिणाम स्पष्ट: अगर अब हस्तक्षेप न हुआ, तो राजस्थान का स्वास्थ्य तंत्र तमिलनाडु से भी तेजी से भरभरा जाएगा। यहां पहले से ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में 80% विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। कल्पना कीजिए, एक गरीब राज्य जहां बुनियादी सुविधाएं ही चरमरा रही, वहां डॉक्टर बेरोजगार होकर स्विगी डिलीवरी बॉय बनें—यह दृश्य कितना हृदयस्पर्शी, कितना वीभत्स!
वैश्विक आईना: जहां विकास सम्मान देता, हमारी नीतियां अपमान
देखिए दुनिया को—जहां चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर और शोध विकसित हैं, वहां डॉक्टर सम्मानित योद्धा हैं। अमेरिका में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:384 (2.6 प्रति 1000) है, और औसत वेतन 2.6 करोड़ रुपये सालाना। 13 20 ब्रिटेन में 1:313 (3.2 प्रति 1000), वेतन औसतन 1.2 करोड़ रुपये सालाना। जर्मनी में 1:233 (4.3 प्रति 1000), जहां विशेषज्ञों का वेतन 3.7 करोड़ रुपये तक पहुंचता है। 13 21 ये देश सिर्फ संख्या नहीं बढ़ाते, गुणवत्ता पर जोर देते—शोध, उन्नत लैब, और सम्मानजनक रोजगार। WHO का मानक 1:1000 है, लेकिन ये देश उससे कहीं आगे हैं, क्योंकि वहां डॉक्टरों को ‘मानव संसाधन’ नहीं, ‘राष्ट्रीय संपदा’ माना जाता। भारत का राष्ट्रीय अनुपात 1:834 है, लेकिन राजस्थान-तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह असंतुलन घातक जहर बन रहा। 4
चेतावनी की घंटी: अब हस्तक्षेप, वरना विनाश
यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं—यह उन हजारों NEET छात्रों का दर्द है, जो माता-पिता की आहों से पढ़ते हैं। प्रिय अभिभावकों, क्या आप अपने बच्चे को ऐसी किस्मत सौंपना चाहते, जहां डिग्री तो मिले, लेकिन जिंदगी न बचे? राजस्थान सरकार, जयपुर के नीति-निर्माताओं से अपील: तत्काल इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट कराएं, नए कॉलेजों पर रोक लगाएं जब तक WHO-NMC मानक पूरे न हों। ग्रामीण CHC में विशेषज्ञों के लिए आकर्षक वेतन और प्रोत्साहन दें। डेंटल काउंसिल और मेडिकल काउंसिल—अज्ञात प्रभावों से ऊपर उठें।
यह रेड फ्लैग है, एक अलार्म जो पूरे समाज को झकझोर रहा। मीडिया, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, चिकित्सा संघ—मिलकर आवाज बुलंद करें। वरना, कल जब कोई मरीज इलाज के अभाव में तड़पेगा, तो हम सब दोषी होंगे। राजस्थान, जागो! तमिलनाडु का दर्द हमारा भविष्य न बने। यह समय संवेदनशीलता का है, कार्रवाई का है—क्योंकि डॉक्टरों का सम्मान बचेगा, तभी राष्ट्र बचेगा।

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