मैनकाइंड फार्मा

मेरठ की गलियों से निकलकर भारत की फार्मा दुनिया में तूफान लाने वाले रमेश जुनेजा की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। साल 1974 में, जब ज्यादातर युवा सपनों के पीछे भाग रहे थे, रमेश एक साधारण मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) बनकर निकले। डिग्री हाथ में लेकर उन्होंने की-फार्मा जॉइन की, और रोज़ाना यूपी रोडवेज की बसों में धक्के खाते हुए डॉक्टरों और मेडिकल स्टोर्स तक पहुंचते।

बसों में सफर, धूल-धक्कड़, घंटों इंतजार—ये सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन एक दिन, एक छोटी-सी दवा की दुकान पर सब कुछ बदल गया।

रमेश दुकान पर अपनी कंपनी की दवाइयां बेचने के लिए खड़े थे। तभी एक गरीब आदमी अंदर आया। उसकी हालत देखकर दिल भर आया—बीमार था, दवा चाहिए थी, लेकिन जेब खाली। दुकानदार ने दवा का बिल बताया, तो वो चुपचाप अपनी जेब से चांदी के गहने निकालने लगा।

“भैया, ये गहने रख लो, बस दवा दे दो… घर में बीमार पड़ा है, कुछ नहीं बचा,” वो आदमी बोला, आंखों में आंसू लिए।

रमेश ने देखा और सोच में पड़ गए। मन में एक सवाल कौंधा—क्या दवा इतनी महंगी होनी चाहिए कि लोग अपने गहने बेचने को मजबूर हों? उसी पल उन्होंने ठान लिया: “नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। मैं ऐसी दवाइयां बनाऊंगा जो क्वालिटी में बेस्ट हों, लेकिन कीमत में इतनी सस्ती कि कोई भी इंसान मजबूर न हो।”

उस घटना ने उनके जीवन की दिशा पलट दी। सालों तक उन्होंने इंडस्ट्री में काम किया, अनुभव जमा किया। फिर 1995 में, अपने छोटे भाई राजीव जुनेजा के साथ मिलकर सिर्फ 50 लाख रुपये के निवेश से मैनकाइंड फार्मा की नींव रखी। शुरुआत छोटी थी—बस 20 कर्मचारी, दो राज्य। लेकिन विजन बड़ा था: “आम आदमी को सस्ती, अच्छी दवाइयां।”

रमेश अक्सर कहते हैं, “हमारा मकसद कभी अमीर बनना नहीं था, बल्कि गरीबों की मदद करना था। दवा वो चीज है जो जिंदगी बचाती है, इसे महंगा करके कोई फायदा नहीं।”

धीरे-धीरे कंपनी बढ़ी। उन्होंने मैनफोर्स (Manforce) जैसे कंडोम ब्रांड को ऐसे प्रमोट किया कि वो बेडरूम की बात से निकलकर टीवी के प्राइम टाइम पर आ गया। प्रेगा न्यूज (Prega News) जैसी प्रोडक्ट्स ने घर-घर पहुंच बनाई। फोकस हमेशा रहा—क्वालिटी हाई, प्राइस लो।

आज? मैनकाइंड फार्मा भारत की चौथी सबसे बड़ी फार्मा कंपनी है। मार्केट कैप लगभग 95,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। IPO के बाद वैल्यूएशन में जबरदस्त उछाल आया। हजारों लोगों को रोजगार मिला, और लाखों-करोड़ों भारतीयों को सस्ती दवाइयां मिल रही हैं।

रमेश जुनेजा की कहानी बताती है कि एक छोटी-सी घटना, एक इंसानी दर्द, अगर दिल को छू ले तो वो सपनों को हकीकत में बदल सकता है। बस ज़रूरत है उस दर्द को अपनी ताकत बनाने की।

तो अगली बार जब आप मैनफोर्स का ऐड देखें या प्रेगा न्यूज इस्तेमाल करें, याद रखिएगा—पीछे एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने बस में सफर करते हुए, एक गरीब की मजबूरी देखकर, पूरी इंडस्ट्री बदल दी।

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