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क्या स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्य निर्धारित किया जाना उचित है ?

चिकित्सा सेवाओं के मूल्य के निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी के बाद चिकित्सकों एवं अस्पताल संचालकों में असमंजस,आक्रोश एवं निराशा का मिश्रित भाव है। देश में अब यह विमर्श चल रहा है कि क्या वाकई स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्य सरकार अथवा कोई एजेंसी निर्धारित कर सकती है ?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यदि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का शुल्क तय करने का प्रयास करती है तो उस से पहले कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का संज्ञान लिया जाना आवश्यक है।
दरअसल,ऐसे दर्जनों कारक हैं जो किसी भी स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता एवम अंततः उस सेवा के मूल्य को भी प्रभावित करते हैं –
स्थान जहां अस्पताल स्थित है
किसी मेट्रोपोलिटन शहर अथवा टियर वन शहर में स्थित अस्पताल की सेवाएं छोटे कस्बों में स्थित अस्पतालों से अधिक होना स्वाभाविक है क्योंकि एक एचसीएफ की स्थापना एवं संचालन का खर्च दोनो स्थानों पर भिन्न होगा।राजकीय अस्पतालों में तो अस्पताल की स्थापना एवं संचालन से लेकर रोगी के सभी खर्च सरकारें वहन करने का दावा करती हैं इसलिए निजी अस्पतालों के इलाज खर्च की तुलना राजकीय अस्पतालों से करना उचित नहीं।

एक ही शहर में स्थित अस्पतालों की सेवाओं का मूल्य
यह भी विभिन्न अस्पतालों की स्थापना एवं संचालन पर आए खर्च की भिन्नता के कारण भिन्न भिन्न होगा। इसे उसी तरह समझ सकते हैं जैसे एक ही शहर के थ्री स्टार या फाइव स्टार होटल का शुल्क भिन्न भिन्न होता है।

एक ही अस्पताल में इलाज ले रहे रोगियों के इलाज का खर्च
यह भी भिन्न हो सकता है जिसके निम्न कारण हो सकते हैं –
A. इलाज करने वाले चिकित्सक की योग्यता
B. इलाज करने वाले चिकित्सक का अनुभव
C. इलाज के लिए रोगी द्वारा चुनी गई सेवाओं का स्तर-जैसे सामान्य वार्ड अथवा प्राइवेट रूम।इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे एक ही फ्लाइट में एक ही गंतव्य पर जा रहे यात्रियों का किराया इकोनॉमी एवं बिजनेस क्लास के अनुसार भिन्न होता होता है
एक ही अस्पताल में एक ही चिकित्सक से एक ही बीमारी का इलाज लेने वाले रोगियों का खर्च
यह खर्च भी भिन्न हो सकता है एवं उसका कारण है-
प्रयोग की गई दवाओं एवं इंप्लांट की गुणवत्ता एवम मूल्य में अंतर- उदाहरण के लिए माननीय सर्वोच्च अदालत ने जिस cataract surgery का उदाहरण दिया है उस cataract surgery में प्रयोग किए जाने वाले लेंस की कीमत 500 रूपय से लेकर एक लाख रुपए से भी अधिक हो सकती है।लगभग सभी इंप्लांट के मूल्य में इसी तरह भारी अंतर होता है।
एक जैसी बीमारी और एक जैसी दवाओं व इंप्लांट के बावजूद भी इलाज का खर्च
सब कुछ एक समान होने के बाद भी इलाज खर्च भिन्न हो सकता है जिसके निम्न कारण हैं-
A. रोगी में इलाज के दौरान हुई कोई अनचाही जटिलता
B रोगी की बीमारी की स्टेज
C रोगी में उपस्थिति अन्य बीमारियां ( comorbities )
D रोगी की बीमारी के प्रति स्वयं की जागरूकता का स्तर
E रोगी एवं परिवार द्वारा इलाज के दौरान रखी गई सावधानियां
F रोगी की इलाज के प्रति Compliance

माननीय सर्वोच्च अदालत द्वारा इलाज का शुल्क निर्धारित करने का विचार बेहद नेक है जिसके लिए माननीय सर्वोच्च अदालत की भूरी भूरी प्रशंसा की जानी चाहिए किंतु ये आशा की जानी चाहिए कि जो भी समिति माननीय अदालत के निर्देशानुसार सेवाओं का शुल्क निर्धारित करेगी वह उपरोक्त सभी बिंदुओं पर अवश्य विचार करेगी। बहुत से चिकित्सक ये भी आशा कर रहे हैं कि जिस तरह माननीय सर्वोच्च अदालत ने स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्य निर्धारण की बात की है उसी तरह अदालतों में वकीलों एवं लीगल फर्म्स द्वारा ली जा रहे शुल्क का मूल्य भी निर्धारित हो क्योंकि स्वास्थ्य के अधिकार की तरह न्याय का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्थिति इतनी विकट है कि कई बार सर्वोच्च अदालत में न्याय की गुहार लगाने के लिए आम व्यक्ति के लिए crowd funding करनी होती है।
-डॉ राज शेखर यादव
फिजिशियन,ब्लॉगर

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