स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्य
माननीय सर्वोच्च अदालत का निर्देश है कि सभी तरह की स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्य सरकार निर्धारित कर सेवाओं के मूल्य में दिख रही भिन्नता को समाप्त करे।
कुछ प्रश्न जिन पर किसी भी निर्णय से पूर्व सरकार विचार करे –
- AIIMS दिल्ली से एमबीबीएस कर रहे छात्र की फीस सालाना पांच हजार रुपए है जबकि अधिकांश निजी और कुछ राजकीय मेडिकल कॉलेजेस में सालाना फीस पच्चीस से तीस लाख रूपया है।वन नेशन वन फीस कब होगा?
- अदालतों में मेडिकल नेगलिजेंस केसेस में जब जुर्माना सुनाया जाता है तो पीड़ित की मृत्यु के समय की आय से भविष्य की आय का अनुमान लगा कर उस राशि की गणना की जाती हैं। इसीलिए जब शिकायतकर्ता कोई धनी एनआरआई होता है तो यह राशि छः करोड़ हो जाती है लेकिन जब कोई गरीब होता है तो उसे दो चार लाख देकर अदालतों में केस निपटा दिया जाता है। अदालतें एक ही मानव जीवन का अलग अलग मूल्य कैसे निर्धारित करती हैं ?
- आलू-प्याज से लेकर पेट्रोल- डीजल तक के मूल्य हर स्थान पर, हर दिन भिन्न होते हैं। ऐसा क्यों ?
- किसी विमान में एक ही श्रेणी में यात्रा कर रहे अधिकांश यात्रियों के किराए अलग अलग होते हैं जबकि विमान का गंतव्य और यात्रियों को मिलने वाली सुविधाएं एक समान होती हैं । एक ही यात्री का आने और जाने का किराया भी भिन्न होता है। ऐसा क्यों है ?
- मेडिकल कॉलेज में एक ही छत के नीचे,एक जैसी शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों की फीस भी भिन्न-भिन्न होती है- सामान्य सरकारी श्रेणी,मैनेजमेंट श्रेणी,आरक्षित श्रेणी, एनआरआई श्रेणी। और अंतर भी इतना कि कक्षा का एक छात्र जहां सालाना पचास हजार फीस देता है वहीं एक अन्य छात्र सालाना तीस लाख रुपए दे रहा है,वो भी राजकीय कॉलेज में। एक ही कॉलेज में ली जा रही फीस में इतनी विषमता क्यों?
मुक्त बाजार व्यवस्था की खूबसूरती यही है कि किसी भी वस्तु का अंतर्निहित मूल्य नहीं होता बल्कि उसका मूल्य उसके ग्राहक निर्धारित करते हैं। यही कारण है जब किसी वस्तु या सेवा का कोई ग्राहक नही होता तो विक्रेता को समय समय पर उसके दाम कम करके उसे बेचने के प्रयास करने पड़ते हैं ताकि अपना नुकसान कम कर सके।
यह सत्य है कि प्रत्येक नागरिक को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए लेकिन यह दायित्व सरकारों का है। वे कर दाता द्वारा दिए गए धन से सरकारी संस्थानों में उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए बाध्य हैं ताकि किसी भी नागरिक को निजी अस्पतालों में जाना ही न पड़े।और यदि वे इसमें विफल रहते हैं तो दोष किसका है आत्म मंथन करें।अपार विविधताओं वाले हेल्थकेयर सेक्टर में यदि ऊल जुलूल प्रयोग होंगे तो नुकसान उस वर्ग का होगा जो अपनी जेब से पैसा खर्च करके विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं लेना चाहता है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में वो सेवाएं उसे नही मिल पाई।
-डॉ राज शेखर यादव
फिजिशियन,ब्लॉगर










