“मेरी MBBS यात्रा” – भाग 5
बायोकेमिस्ट्री की तीन देवियाँ, डिसेक्शन हॉल, व्हाइट हॉल पहला प्रोफेशनल एग्जाम और फर्स्ट ईयर का अंत
रिफ्लेक्स वाले उस ऐतिहासिक कांड के बाद मैंने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि मेडिकल कॉलेज में किताबें कम और शिक्षक ज़्यादा पढ़ाते हैं। हर शिक्षक का अपना अलग अंदाज़ था और उसी अंदाज़ के साथ धीरे-धीरे हम भी मेडिकल की दुनिया में ढलते जा रहे थे।शायद यही वजह थी हम जिस कॉलेज में थे वहां के MBBS छात्र की मेडिकल शिक्षा और समझ बाकी जगहों से कही अच्छी होती थी।
फिजियोलॉजी विभाग अपने आप में एक अलग संसार था।
विभागाध्यक्ष डॉ सुनीता तिवारी जी और विभाग की जान थे प्रो. डॉ. नरसिंह वर्मा सर। उनका डायबिटीज और हाइपरटेंशन पर किए गए शोध उल्लेखनीय थे, इसीलिए उनकी कोई भी क्लास इंसुलिन का ज़िक्र किए बिना पूरी हो जाए, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो। इंसुलिन उनके लिए केवल एक हार्मोन नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का सबसे अहम किरदार था जो हर जगह आ जाता था।
उधर डॉ. प्रदीप सर को दुनिया के हर मरीज में सबसे पहले Breath Sounds ही सुनाई देते थे। ऐसा लगता था कि स्टेथोस्कोप उनके कानों से नहीं, दिल से जुड़ा हुआ है।
और फिर आते थे हमारे सबसे प्रिय शिक्षक डॉ. भट्टाचार्य सर।
उनकी दुनिया RBC, WBC और Platelets के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। लेकिन सच कहूँ तो पढ़ाने का उनका तरीका इतना सहज था कि जो छात्र पढ़ना नहीं चाहता था, उसके दिमाग में भी विषय अपने आप उतर जाता था। आज भी जब CBC रिपोर्ट हाथ में आती है तो कहीं न कहीं उनकी आवाज़ कानों में गूंज ही जाती है।
फिजियोलॉजी से निकलकर हम पहुँचते थे बायोकेमिस्ट्री विभाग…
जहाँ विभागाध्यक्ष थे प्रो. डॉ. अब्बास अली मेहंदी सर। बहुत हे मेहनती सरल और अनुशासनात्मक व्यक्तित्व
विभाग में दो अन्य शिक्षक थे जिन्हें सीनियर बैच प्यार से “रंगा” और “बिल्ला” कहा करता था।मुझे नहीं पता क्यों पर ये संज्ञा उनको सीनियर बैच से मिली थी, बाकी पूरा विभाग मानो तीन देवियों के भरोसे चलता था।
और उनमें भी मेरी सबसे पसंदीदा थीं… Shivani Pandey 🙏
डॉ. शिवानी मैम। बहुत ही शख्त मिजाज की और बच्चों के लिए मेहनत करने वाली शिक्षिका और उनका फेवरेट लाइन ” मेरी नजरों में मत आना”
पूरी क्लास उनसे डरती थी।
लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा इंतज़ार रहता था कि कब मैम कोई प्रश्न पूछें और मैं उसका उत्तर देकर उनकी नज़रों में थोड़ा-सा स्थान बना सकूँ। मैं अक्सर उनके गुस्से से अपने जवाब देकर बच जाया करता था तो मेरा बैच मुझे संदेह भरी नजरों से देखता था और कहता था कि शायद कही विनय की शादी के रिश्ते की बात तो नहीं चल रही है 🤣🤣
उन्होंने बायोकेमिस्ट्री जैसा कठिन विषय भी इस तरह पढ़ाया कि उससे प्रेम होने लगा। आज भी जब किसी बच्चे की LFT, KFT या मेटाबॉलिक प्रोफाइल देखता हूँ, तो कहीं न कहीं उनकी पढ़ाई याद आ जाती है। वो आज भी मेरे फेसबुक से जुड़ी हुई है और शायद ये पोस्ट भी पढ़ रही होंगी।
लेकिन एक दिन बायोकेमिस्ट्री विभाग में ऐसा हादसा हुआ जिसका खामियाज़ा पूरे बैच ने भुगता।
अब्बास सर अपनी क्लास में लैपटॉप लगाकर कुछ देर के लिए बाहर गए थे।
इतने में हमारे ही बैच के एक होनहार छात्र ने सोचा कि क्यों न सर की PPT अपनी पेनड्राइव में कॉपी कर ली जाए।
इरादा नेक था…
लेकिन किस्मत खराब थी।
कॉपी करते-करते पता नहीं कैसे सर की कुछ मूल फाइलें ही डिलीट हो गईं।
सर वापस आए…
लैपटॉप खोला…
कुछ क्षण स्क्रीन देखते रहे…
फिर बिना एक शब्द बोले लैपटॉप बंद किया और क्लास छोड़कर बाहर चले गए।
उस दिन उनके चेहरे का गुस्सा देखकर पूरी क्लास की बायोकेमिस्ट्री पहले ही बिगड़ चुकी थी।
और शायद उसी दिन उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था कि इस बैच को बायोकेमिस्ट्री इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली।
परिणाम यह हुआ कि प्री प्रोफेशनल के बायोकेमिस्ट्री एग्जाम में हमारा पूरा बैच इतिहास रचने के करीब पहुँच गया और पूरा का पूरा बैच फेल हो गया ।
एक साथ इतने छात्रों का संघर्ष शायद ही विभाग ने पहले देखा होगा।
उधर दिन के दूसरे हिस्से में लंच के बाद हमारी मुलाकात होती थी मेडिकल कॉलेज की सबसे रहस्यमयी और दिलचस्प जगह से…
Dissection Hall…
दोपहर का खाना खाने के बाद आधा बैच वैसे ही नींद से लड़ रहा होता था।
लेकिन DH में कदम रखते ही Formalin की तीखी गंध सारी नींद पल भर में गायब कर देती थी।
शुरुआत में वहाँ रखे कैडेवर(मृत व्यक्तियों के दान किए गए शरीर )को देखकर मन में अजीब-सा डर बैठ जाता था।
धीरे-धीरे वही कैडेवर हमारे सबसे बड़े शिक्षक बन गए।उन सभी व्यक्तियों को नमन जिनकी वजह से आज हम इस जगह पर हैं।
DH में छात्रों की भी दो प्रजातियाँ होती थीं।
पहली…
जो Cunningham खोलकर पूरी तल्लीनता से डिसेक्शन किट से अपने forceps और स्केलपेल निकल कर आहिस्ता आहिस्ता Skin, Superficial Fascia, Deep Fascia, Fat और Muscles हटाते हुए खुद को भविष्य का सर्जन समझने लगते थे।
और दूसरी…
जो एक कोने में बैठकर गप्पें मारते, आसपास की गतिविधियाँ देखते और मेहनत करने वालों पर तंज कसते रहते।
सच कहूँ तो हर माइक्रोबैच में ये दोनों प्रकार बराबर संख्या में मौजूद रहते थे।
फिर आती थी…
Histology Lab…
आज तक समझ नहीं आया कि उसकी क्लास आखिर होती क्यों थी।
Microscope में स्लाइड देखकर कुछ समझने से आसान था कि उसे रट लिया जाए।
कौन-सा हिस्सा Eosin से गुलाबी होगा…
कौन-सा Hematoxylin से नीला…
Cell कहाँ है…
Nucleus कहाँ है…
ये सब याद करते-करते मेरा अपना Hemoglobin कम हो जाया करता था।
दिन यूँ ही गुजरते रहे।
बीच-बीच में Part Viva…
Ward Leaving Viva…
Grand Viva…
और न जाने कितने Viva…
शुरुआत में “Viva” शब्द सुनते ही दिल की धड़कन बढ़ जाती थी।
लेकिन मेडिकल कॉलेज इंसान को हर चीज़ का आदी बना देता है।
कुछ महीनों बाद स्थिति यह हो गई थी कि कोई छुट्टियाँ बिताकर शाम को हॉस्टल लौटे और पता चले कि कल Viva है…
तो भी चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी।
क्योंकि अब समझ आ गया था…
यह तो सिर्फ शुरुआत है।
आगे जिंदगी ऐसे-ऐसे इम्तिहान लेने वाली है जहाँ Viva से डरने वालों की कोई जगह नहीं होगी।
इसी बीच मैंने पढ़ने वालों की भी तीन अलग-अलग जातियाँ खोज निकाली थीं।
पहली…
जो पूरे साल थोड़ा-थोड़ा पढ़ते रहते थे।
फिर परीक्षा के समय आराम से पास भी हो जाते थे और अपने दोस्तों, यहाँ तक कि अपनी महिला मित्रों को भी पढ़ाकर निकाल देते थे।
दूसरी…
बजरंगी ग्रुप के योद्धा।
जो पूरे साल भगवान भरोसे रहते थे और परीक्षा से पाँच दिन पहले दिल, जिगर, गुर्दा—सब कुछ पढ़ाई में झोंक देते थे।
और किसी चमत्कार की तरह हर बार पास भी हो जाते थे।
तीसरी श्रेणी…
ये लोग इंसान कम, चलती-फिरती लाइब्रेरी ज्यादा होते थे।
पूरा साल Library और Study Room में मिलते।
ऐसा लगता था कि किताबों के अलावा इन्होंने MBBS में किसी और चीज़ को हाथ ही नहीं लगाया।
परीक्षा इनके लिए पास होने की नहीं, Top करने की होती थी।
अगर एक नंबर भी कम हो जाए…
तो उनकी आत्मा कई दिनों तक बेचैन रहती थी।
हम इन्हें प्यार से “किताबी कीड़े” या “कठोर चरसी” कहा करते थे।
जैसे-जैसे फर्स्ट प्रोफेशनल परीक्षा नज़दीक आती गई, पूरा KGMU बदलने लगा।
जो हॉस्टल कुछ दिन पहले तक हँसी-ठिठोली, गिटार, क्रिकेट और गप्पों से गूंजते थे, वहाँ अब सिर्फ किताबों के पन्ने पलटने की आवाज़ सुनाई देती थी।
रोज़ जिन कमरों की लाइट रात 10–11 बजे तक बुझ जाती थी, उन्हीं कमरों की रोशनियाँ अब सुबह 2-3 बजे तक सामान्य रूप से जलती रहती थीं। ऐसा लगता था मानो पूरा मेडिकल कॉलेज नींद से समझौता कर चुका हो।
कमरों में चार-पाँच दोस्तों के छोटे-छोटे समूह बन जाते थे। किसी की Anatomy मजबूत थी, किसी की Physiology, तो किसी की Biochemistry। हर कोई अपना सबसे अच्छा विषय दूसरों को पढ़ाता था। नोट्स, शॉर्ट ट्रिक्स, डायग्राम, Mnemonics—सब बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे के साथ बाँटे जाते थे।
शायद यही मेडिकल कॉलेज की सबसे बड़ी खूबसूरती है…
यहाँ प्रतियोगिता से पहले साथ चलना सिखाया जाता है।
हॉस्टल के बाहर जाने वाली छात्रों की भीड़ भी अचानक थम जाती थी। जिन रास्तों पर शाम को चहल-पहल रहती थी, वहाँ अब सन्नाटा पसरा होता था। किसी के पास बाहर घूमने का समय नहीं था। सबकी मंज़िल एक ही थी—पहला प्रोफेशनल एग्जाम
लेकिन हर छात्र उस दबाव को अलग-अलग तरीके से जी रहा था।
कुछ ऐसे थे जिनके शांत चेहरे देखकर लगता था कि उन्हें कोई चिंता ही नहीं है, जबकि भीतर वे हर पल खुद से लड़ रहे होते थे।
कुछ पूरे साल की मेहनत के बाद सिर्फ अपने नोट्स दोहरा रहे थे और मन ही मन संतुष्ट थे कि अब जो होगा देखा जाएगा।
और कुछ…
रात के एक-दो बजे भी कॉलेज के बाहर Queen Mary Hospital के पास वाली चाय की दुकान पर चाय की प्याली हाथ में लिए खड़े मिल जाते थे। उनके हाथों में चाय होती थी… और कई लोगों की उँगलियों के बीच सिगरेट भी।
शायद धुएँ का हर कश उन्हें कुछ पल के लिए परीक्षा का दबाव हल्का महसूस कराता होगा।
मैंने कभी उस धुएँ का स्वाद नहीं चखा। हाँ, मन में इतनी उत्सुकता ज़रूर रहती थी कि आखिर ऐसी क्या बात है, जिसके बिना लोग रह नहीं पाते।
मेरे लिए तो वही कुल्हड़ की चाय ही नशा करने के लिए काफी थी।
उसी चाय की दुकान पर सीनियरों के साथ बैठकर आने वाली परीक्षा की रणनीति बनती, पिछले वर्षों के प्रश्नों की चर्चा होती, और बीच-बीच में उनकी एक बात सबसे ज्यादा हौसला देती—
“घबराना मत… White Hall में पहुँचते ही आधी लड़ाई अपने आप जीत जाओगे।”
धीरे-धीरे रात बीतती रहती…
और पूरा KGMU जागता रहता।
उस समय सचमुच लगता था कि यह सिर्फ एक मेडिकल कॉलेज नहीं, बल्कि हजारों सपनों की ऐसी प्रयोगशाला है जहाँ हर कमरे में कोई न कोई अपने भविष्य को गढ़ने में लगा है।
देखते ही देखते फर्स्ट प्रोफेशनल परीक्षा की तारीख आ गई।
कोई Sambhulingam में डूबा हुआ था।
कोई BD Chaurasia की लाल किताब पीली कर चुका था।
कोई Harsh Mohan के साथ संघर्ष कर रहा था।
तो कोई खुद को प्रोफेशनल दिखाने के लिए हाथ में Guyton लेकर घूम रहा था।
लेकिन एक बात मेडिकल कॉलेज की हमेशा याद रहेगी…
सीनियर्स।
हर सीनियर बड़े भाई की तरह अपने नोट्स जूनियर्स तक पहुँचाता था।
कोई विषय समझ न आए तो बस एक आवाज़ लगती—
“बड़े डॉक्टर साहब…!”
और कुछ ही देर में मदद पहुँच जाती थी।
यही परंपरा शायद मेडिकल कॉलेजों की सबसे खूबसूरत विरासत है।
फिर आया…
वह दिन…
जिसका पूरे साल इंतज़ार भी था और डर भी।
पहला प्रोफेशनल एग्जाम (फाइनल एग्जाम)
सुबह-सुबह सब अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर, जेब में एडमिट कार्ड और हाथ में पेन लेकर White Hall की ओर बढ़ रहे थे।
कुछ “चरसी” आखिरी पाँच मिनट में भी पता नहीं कैसे से जरूरी Questions दोहराने में लगे थे।
और उस दिन अपनी बेचैनी को बाहर हे छोड़कर मैं…
शांत मन से अपनी सीट पर बैठकर White Hall को निहार रहा था।
कितने डॉक्टर…
कितनी पीढ़ियाँ…
कितने सपने…
इस हॉल से होकर गुज़रे होंगे।
आज उसी कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य मुझे मिला था।
एक-एक करके Anatomy…
Physiology…
और सबसे कठिन Biochemistry…
तीनों की थ्योरी परीक्षाएँ समाप्त हुईं।
थ्योरी पेपर खत्म होते ही हमें लगता था कि अब आधी लड़ाई जीत ली…
लेकिन असली अग्निपरीक्षा तो अभी बाकी होती थी…
Viva.
वाइवा का माहौल ही अलग होता था।
बाहर बैठे छात्रों के चेहरों पर ऐसी खामोशी होती थी जैसे ऑपरेशन थिएटर के बाहर किसी मरीज के परिजन बैठे हों। कोई किताब के पन्ने पलट रहा होता, कोई नोट्स दोहरा रहा होता, तो कोई मन ही मन भगवान से आखिरी बार “पास करा देना” वाली प्रार्थना कर रहा होता।
और हमारे बैच का सबसे दुर्भाग्यशाली योद्धा था…
रोल नंबर 1। Abdullah Faisal
हर परीक्षा में सबसे पहले उसी का नाम पुकारा जाता।
वह बड़ी शांति से उठकर अंदर जाता, लेकिन हमें पता होता था कि अगले कुछ मिनटों में वह वही झेलने वाला है, जो सीमा पर सबसे आगे खड़ा जवान पहली गोली झेलता है।
क्योंकि एग्जामिनर का पहला सवाल…
पहला मूड…
पहला गुस्सा…
और पहली मुस्कान…
सब उसी के हिस्से में आती थी।
अंदर क्या हो रहा है, किसी को कुछ पता नहीं होता था।
हम सब बाहर बैठे बस दरवाज़े को देखते रहते।
फिर कुछ देर बाद वह बाहर निकलता…
चेहरे पर थकान, आँखों में राहत और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लिए।
उसके बाहर आते ही सब लोग उसे ऐसे घेर लेते जैसे किसी युद्ध से लौटे सैनिक से मोर्चे की खबर ली जा रही हो।
“कौन-सा टॉपिक पूछा?”
“सर का मूड कैसा है?”
“डायग्राम बनवाया क्या?”
“कितनी देर रोका?”
और बेचारा…
अभी-अभी अपने डर से बाहर निकला होता, फिर भी पूरी ईमानदारी से अंदर की हर गतिविधि हमें बता देता।
उसकी बताई हुई बातें सुनकर अगले छात्रों का आधा डर वैसे ही कम हो जाता था।
आज सोचता हूँ…
शायद हर बैच में ऐसा एक रोल नंबर 1 होना ही चाहिए…
जो सबसे पहले अंदर जाकर अनजाने डर का सामना करे और फिर बाहर आकर अपने दोस्तों का हौसला बढ़ाए।
हाँ, एक बात का यकीन है…
अगर उससे उस समय पूछा जाता कि भविष्य में अपने बच्चों का नाम क्या रखोगे…
तो शायद वह मुस्कुराकर यही कहता—
“बस इतना तय है… नाम ‘A’ से तो बिल्कुल नहीं रखूँगा। रोल नंबर 1 बनने का दर्द मैं झेल चुका हूँ, अपने बच्चों को नहीं झेलने दूँगा!”
और हम सब…
ठहाका लगाकर फिर अगले नाम के पुकारे जाने का इंतज़ार करने लगते।
और आखिर सभी परीक्षाएं पूरी हुई
ऐसा लगा जैसे महीनों से रुकी हुई साँस आखिरकार वापस आ गई हो।
अब सिर्फ परिणाम का इंतज़ार था।
और इंतज़ार के उन दिनों में हमारी सबसे पसंदीदा जगह बन चुका था…
हज़रतगंज।
उस समय “Ganjing” करना किसी ट्रेंड से कम नहीं था।
कभी बड़ा इमामबाड़ा…
कभी कुड़िया घाट…
कभी चौक की गलियाँ…
कभी श्री के छोले-भटूरे…
कभी राम आसरे की मिठाइयाँ…
और जब जेब हल्की होती थी…
तो एक ही नाम याद आता था—
विक्की ढाबा।
कम पैसों में पेट भी भर जाता था और दिल भी।
साल 2021 में जब Pediatric Oncology Fellowship के लिए फिर से KGMU लौटा, तो सबसे पहले विक्की ढाबे पर ही गया।
पहला निवाला खाते ही लगा…
कुछ जगहें बदलती नहीं…
वे सिर्फ आपका इंतज़ार करती हैं।
फर्स्ट ईयर अब समाप्त होने वाला था।
कुछ दोस्त घर लौट चुके थे।
कुछ अभी भी हॉस्टल में छुट्टियों का आनंद ले रहे थे।
उधर गोमती नदी के किनारे बने TG Hostel का आवंटन शुरू हो चुका था।
क्योंकि अब वक्त था…
हमारे जूनियर्स के आने का।
और पहली बार…
किसी के “सीनियर” कहलाने का।
लेकिन…
क्या हम सब फर्स्ट प्रोफेशनल में पास हो गए?
रिजल्ट वाले दिन क्या हुआ?
पहली ट्रिप में कौन-सी घटना हमेशा के लिए यादगार बन गई?
और जूनियर्स के आने के बाद हम सच में कैसे सीनियर बने?
इन सभी किस्सों के साथ मिलते हैं…
“मेरी मेडिकल यात्रा–भाग 6” में।
आपका अपना
- डॉ विनय कुमार शुक्ल 🩺 👨⚕️🖋️










