स्वास्थ्य न्यायालय ( जनहित में चिकित्सकों का सुझाव )

जब से चिकित्सको को consumer Court के अंतर्गत लाया गया , उसके बाद हो सकता हो कुछ मरीजो को लाभ हुआ हो , परंतु लाखों मरीजों का नुकसान भी हुआ है शायद, क्योंकि अतिगंभीर मरीजो को ईलाज करने के लिए चिकित्सको में एक भय बैठ गया है , पहले जहाँ क्लीनिकल वर्क की तरफ ध्यान होता था,लेकिन बदली परिस्थितियों में कोर्ट कचहरी से बचने के लिए पेपर वर्क पर ज्यादा फोकस रखते है, एम्बुलेंस डेथ का ग्राफ अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ना उसी की परिणीति है शायद, क्योंकि डॉक्टर्स के अंदर भय है कि अतिगंभीर मरीज में सोचने का या बुक खोलने का , या किसी साथी चिकित्सक से राय लेने क़ा समय तो होता नही , जो करना है तुरंत करना है ,बिना वक़्त बर्बाद किये फैसला लेना होता है, ऐसे में मरीज के हित मे लिया गया निर्णय अगर गलत हो गया तो कोर्ट में & मीडिया ट्रायल में उनको क्रिमिनल की तरह ट्रीट किया जायेगा , लाखो करोड़ो का अर्थदण्ड, और ऐसे लोग निर्णय लेंगे जिनको मेडिकल साइंस का क्लीनिकल अनुभव, बारीकियां & प्रैक्टिकल नॉलेज नही होती , जनहित में चिकित्सको में भय का वातावरण खत्म करना बहुत जरूरी है अन्यथा स्थिति दिनोंदिन और बदतर होती चली जायेगी ,
इसका सबसे अच्छा उपाय है " स्वास्थ्य न्यायपालिका " जिससे चिकित्सको में भय खत्म होगा क्योंकि जांच करने वाले को & निर्णय सुनाने वाले को मेडिकल साइंस का व्यहारिक ज्ञान है ।

जिस तरह से राजस्व से संबंधित केसों का निपटारा डी एम, एसडीएम द्वारा होता है , ठीक उसी तरह स्वास्थ्य संबंधी केसों का निपटारा " स्वास्थ्य न्यायपालिका " करे ,
जनपद स्तर पर कुछ सरकारी चिकित्सको को ज्यूडिशरी पॉवर देना वक्त की जरूरत है , क्योंकि माननीय न्यायालयो के पास कार्य का बोझ बहुत ज्यादा है ,

स्वास्थ्य न्यायपालिका के अंतर्गत चिकित्सा संबंधित केस के अलावा खाद्य पदार्थो में मिलावट जैसा घिनौना & अक्षम्य कारोबार , नकली या अधोमानक औषधियों से संबंधित केस का त्वरित निपटारा हो सके ।

स्वस्थ भारत के लिए अधिक से अधिक शेयर करे , नीति आयोग को भेजे , प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे ।
जय हिंद जय भारत

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