ऐसा बर्ताव होगा तो कौन डॉक्टर बनना चाहेगा

जब स्कूल में था तो मेरे कई दोस्त प्रवेश परीक्षा की तैयारी करते रहते थे। उन दिनों और शायद आज भी विज्ञान के छात्रों के लिए मेडिसीन और इंजीनियरिंग सबसे लोकप्रिय विकल्प थे। मैंने इंजीनियरिंग को चुना। आज जब मैं अपने देश में डॉक्टरों की हालत देखता हूं तो मैं शुक्र मनाता हूं कि मैंने डॉक्टर बनने का चुनाव नहीं किया। न जाने कैसे भारत में हमें डॉक्टरों से ये सब होने की अपेक्षा रहती है कि वे प्रखर बुद्धि के होने चाहिए, दशकों तक पढ़ाई करते रहने को तैयार रहने चाहिए, दूरदराज के ग्रामीण इलाकों सहित सारी विपरीत परिस्थितियों में काम करने के लिए राजी होने चाहिए, पैसा कमाने को लेकर मन में अपराध बोध होना चाहिए, कुछ भी गलत हो जाए तो उसकी जवाबदारी लेनी चाहिए, लालची दानवों जैसी छवि के लिए तैयार रहना चाहिए और फिर समय-समय पर गुस्सैल भीड़ द्वारा उनकी पिटाई भी होनी चाहिए। वाह! जो लोग हमारी जान बचाते हैं उनसे व्यवहार का क्या अच्छा तरीका है, नहीं?

विडंबना है कि यह सब तब हो रहा है जब भारतीय राष्ट्रवाद की भावना चरम पर है और फिल्में व टीवी कार्यक्रम सैनिकों की जय जयकार कर रहे हैं, क्योंकि वे हमारी ज़िंदगी को सुरक्षा देते हैं और हमारी ज़िंदगी बचाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सैनिक सम्मान के हकदार हैं, क्योंकि वे हमारी ज़िंदगी बचाते हैं लेकिन, वे ऐसा सिर्फ सैन्य टकराव के दौरान करते हैं। डॉक्टर तो आपको और आपके प्रियजनों की ज़िंदगियां हर दिन बचाते हैं। फिर हम उनकी पिटाई क्यों कर रहे हैं? हम उन्हें यह खौंफनाक अहसास क्यों करा रहे हैं, जबकि वे तो मानव को ज्ञात सबसे अच्छे पेशे में काम कर रहे हैं? इसके कई कारण हैं। एक, हमें देश की बहुत ही खराब स्वास्थ्य प्रणाली के लिए बलि का बकरा चाहिए। हम चाहे जितने राष्ट्रवादी बन जाए लेकिन, वास्तविकता यही है कि हम तीसरी दुनिया के देश हैं, जो विकसित विश्व की तुलना में बहुत कम पैसा कमाता है। जब तक यह तथ्य नहीं बदलता, हम इस वास्तविकता को नहीं बदल सकते कि सवा अरब से ज्यादा आबादी को अच्छी स्वास्थ्य प्रणाली देने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

अस्पताल चलाना, टेस्ट, इलाज, सर्जरी करना, दवाइयां देना इस सबमें पैसा लगता है। इनमें गुणवत्ता हासिल करना महंगा होता है और सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि जो लोग आपका इलाज कर रहे हैं यानी खुद डॉक्टर भी एक निश्चित योग्यता व क्षमता के होने चाहिए। आखिरी बिंदु का मतलब है कि हमें सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा यानी हमारे सर्वाधिक स्मार्ट लोगों को इस पेशे की ओर आकर्षित करना होगा। यानी हमें इस श्रेष्ठता का मूल्य समझना होगा, इसको उचित तरीके से प्रोत्साहन देना होगा और इसमें राजनीति मिलाने से बचना होगा। हालांकि, हम तो ठीक उलटा कर रहे हैं। इसलिए यदि भारत में कोई डॉक्टर बनने की गलती कर देता है तो हम उससे दुनिया को बचाने वाले की भूमिका की अपेक्षा करने लगते हैं। उन्हें हर मामले में कमतरी को स्वीकार करना होगा, अन्य क्षेत्रों में समान बुद्धिमत्ता के लोगों से कम भुगतान और सुरक्षित होने का अहसास भी नहीं। यदि वे इसे अनुचित बताते हैं तो हम नैतिक रूप से उन्हें दोषी ठहराते हैं और उनसे पूछते हैं कि वे डॉक्टर बने ही क्यों? इसलिए क्या यह आश्चर्य की बात है कि हमारे सर्वोत्तम डॉक्टर विदेश भाग रहे हैं या इससे भी बुरी बात तो यह है कि प्रतिभाशाली लोग डॉक्टर ही नहीं बनना चाहते?

भारत में एक प्रवृत्ति यह है कि यदि कुछ अच्छा हो तो इसमें किसी प्रकार की राजनीति लाकर उसे नष्ट कर दो। क्योंकि कुल-मिलाकर तो राजनीति लोगों की ही इच्छा होती है, नहीं? यदि अच्छे स्कूल हों तो हम उन पर दर्जनों नियम लागू कर देते हैं। अच्छी मेट्रो हो तो महिलाओं को मुफ्त टिकट की घोषणा कर उसका संचालन अव्यावहारिक बना देते हैं। इसमें हमें एक साधारण तथ्य नहीं दिखता। यदि आप स्कूलों के नियम बहुत बोझिल बना देंगे या मेट्रो का संचालन अव्यावहारिक बना देंगे तो लोग स्कूल नहीं खोलेंगे और अधिक मेट्रो नहीं बनाई जाएंगी। इसी तरह यदि हम डॉक्टरों को सताएंगे, तो हम श्रेष्ठतम लोगों को इस पेशे में आने से हतोत्साहित करेंगे।

लेकिन, डॉक्टरों से तो निस्वार्थी होने की अपेक्षा रहती है, नहीं? उन्हें तो सारी तकलीफें उठाते रहकर चौबीसों घंटे बस लोगों का इलाज करते रहना चाहिए और पैसा नहीं कमाना चाहिए, क्या वाकई? इसका उत्तर तो ‘नहीं’ है। डॉक्टर समाज की भलाई के लिए काम करते हैं लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि वे यह काम मुनाफे के लिए नहीं कर सकते या वे अपनी जरूरतों व सहूलियतों की अनदेखी कर दें। सही है कि ऐसे दुर्लभ लोग भी हैं, जो समाज का भला करते हैं और इससे उन्हें कोई व्यक्तिगत फायदा भी नहीं होता जैसे अण्णा हजारे और मदर टेरेसा। हालांकि, उनकी संख्या इतनी नहीं है कि वे देश की स्वास्थ्य रक्षा की जरूरतें पूरी कर सकें। समाज की भलाई करने वाले लोगों की एक और श्रेणी भी है। ऐसे लोग जो समाज की मदद करते हैं पर पैसा भी कमाते हैं। वे अण्णा हजारे और मदर टेरेसा जैसे नहीं हैं। लेकिन, वैसे तो आप और मैं, या कहें कि ज्यादातर लोग नहीं होते। हममें से ज्यादातर लोग समाज का भला करना चाहते हैं पर अच्छी ज़िंदगी भी चाहते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। सच तो यह है कि ऐसे लोगों की काफी जरूरत है। एक आंत्रप्रेन्योर, जो पैसा कमाता है पर नौकरी भी देता है और टैक्स भी चुकाता है, समाज का भला कर रहा होता है। फिर वह अपने मुनाफे से हासिल की गई लग्ज़री कार में घूमता है या नहीं, वह प्रासंगिक नहीं है। एक डॉक्टर जो लोगों का इलाज करता है लेकिन, अपने लिए भी अच्छी, सम्मानजनक ज़िंदगी चाहता है (ताकि उसे डॉक्टरी पढ़ने की बजाय एमबीए न करने का मलाल न हो), वह भी समाज के लिए अच्छा काम कर रहा होता है। भारतीय लोकाचार की यह धारणा कि अच्छे लोग आवश्यक रूप से गरीब होने चाहिए या उनकी अपनी कोई जरूरतें नहीं होतीं, अब विदा हो जानी चाहिए। इससे तो पाखंड (क्योंकि हम मानव इस तरह व्यवहार नहीं करते), अनैतिकता, गैरवाजिब अपेक्षाएं और डॉक्टर के मामले में तो उनके प्रति अजीब तरह की शत्रुता जन्म लेती है। कृपया इस बात को समझिए। हमें डॉक्टरों के रूप में सबसे स्मार्ट और श्रेष्ठतम लोग चाहिए। दयनीय स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली का मतलब यह भी है कि भारतीय डॉक्टरों पर अत्यधिक दबाव है। इसलिए उन लोगों के प्रति कुछ सम्मान और करुणा दिखाइए, जो अक्षरश: आपको ज़िंदगी देते हैं। देश के डॉक्टरों के साथ खड़े रहिए और उन्हें सुरक्षा दीजिए, जो हमें सुरक्षित रखते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार chetan.bhagat@gmail.com

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