Ramdev

*गंभीर चिंतन,आत्ममंथन*

*(कुछ जरूरी बिंदु)*

*किसी भी व्यक्ति के पूर्व में किये अच्छे कर्मों के आधार पर उसे जो सम्मान दिया गया,वो तत्कालीन था।उसे वर्तमान में किये जा रहे कर्मों के आधार पर ही सम्मान मिलना चाहिए।उसे लगातार सम्मान पाने के लिए लगातार सम्मानजनक कार्य करने होंगे।अंधभक्ति आदमी को अंधा बना देती है।*

*उदाहरण के तौर पर ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार तब खूब सम्मानित किए गए,किंतु आज जूनियर पहलवान व अपने शिष्य धनराज जाखड़ की हत्या के जुर्म में कानूनी कार्यवाही से जूझ रहे हैं।*

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*बाबा रामदेव के सम्बंध में भी वही बात लागू होती है।योग गुरु के रूप में भारतवर्ष का नाम पूरी दुनियां में रोशन करने वाले बाबा रामदेव ने जब से अपने योग के विशालकाय नेटवर्क को आयुर्वेद व नेचुरोपैथी से जोड़ा,यह दूसरा प्रशंसनीय एवं उत्कृष्ट कार्य रहा।

“प्रिवेंशन इज़ बेटर देन क्योर” यानी “इलाज से बेहतर है बचाव” के सर्वमान्य सिद्धान्त को बखूबी प्रतिपादित किया।

ये सर्वविदित सर्वमान्य शाश्वत सत्य है कि स्वास्थ्य के चार मजबूत स्तंभ…पौष्टिक आहार,भरपूर नींद,नियमित व्यायाम व सकारात्मक सोच होते हैं जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन की भी मान्यता प्राप्त है।

बाबा रामदेव जी ने योग प्रशिक्षक की भूमिका निभाते हुए “योग गुरु” की सर्वमान्य मान्यता पाई।

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अति प्राचीन विशुद्ध भारतीय सनातन धर्म संगत आयुर्वेद की जड़ी बूटियों का ज्ञान करवाया किंतु…..वे आयुर्वेद के मान्यता प्राप्त अधिकृत व्यक्ति नहीं थे।इधर उधर से सीखकर मान्यता प्राप्त आयुर्वेदाचार्यों से सीख कर एक कुशल आयुर्वेदिक चिकित्सक के कुशल कम्पाउण्डर मात्र थे और आज तक भी वही हैं।उनके पास आयुर्वेद की आज तक कोई मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं है।

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*बाबा रामदेव हरिद्वार में साईकल पर शहद बेचा करते थे।उनके मन में पतंजलि का ख्याल आया।वे आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करना चाहने लग गए थे किंतु लाइसेंस नहीं था।कानूनी रूप से पतंजलि चलाने के लिए उनके प्रथम सहयोगी आयुर्वेदाचार्य श्री योगानंद जी के आयुर्वेदिक लाइसेंस का इस्तेमाल किया था।

श्री योगानंद जी की मृत्यु कैसे हुई,ये रहस्य का विषय है।बाबा रामदेव के गुरु शंकरदेव जी महाराज की भी मृत्यु हो गयी।राजीव दीक्षित जी भी संपर्क में रहे थे।वे स्वदेशी के भक्त व कुशल वक्ता थे।यू ट्यूब में देखेंगे तो मेरी तरह आप भी राजीव दीक्षित जी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे।उनकी भी मृत्यु हो गयी।कोई कहता है जहर से हुई,रामदेव जी कहते हैं हार्ट अटैक से हुई।वे कहते हैं भिलाई के जिस अस्पताल में राजीव जी अंतिम समय में भर्ती हुए थे,डॉक्टर्स ने बताया कि हार्ट अटैक आया था।राजीव जी जवान खूबसूरत व हट्टे कट्टे स्वस्थ व्यक्ति थे।

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*यहां से एक नया मोड़ आया।बाबा जी दवाई बनाना चाह रहे थे।दवाई पास नहीं हो रही थी।उन्होंने फ़ूड सप्पलीमेंट्स का लाइसेंस लेकर उन्हें आयुर्वेदिक दवाई बताकर बेचने लगे और खुद स्वयम्भू ब्रांड एम्बेसडर बन कर विज्ञापन करने लगे।

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*खुद विज्ञापन करने के पीछे 2 बातें हो सकती थीं।या तो वे पैसा बचाना चाहते थे या फिर कोई सेलिब्रिटी दवाई का विज्ञापन करने के लिए अधिकृत ही नहीं था।वरना बाबा जी चूकने वालों में नहीं लगते।

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*ऐसा भी प्रतीत होता है,लोगों के मुंह से भी सुना है कि सरकार के संरक्षण के चलते ये सब सम्भव हो पाया या अभी भी चल रहा है।उनकी जगह कोई भी और होता तो फ़ूड सप्पलीमेंट्स को दवाई बताने का झूठा विज्ञापन करने के जुर्म में सज़ा काट रहा होता।

*(अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान)?*

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जब देखा कि रास्ता साफ है,कोई विरोध नहीं है तो योग और आयुर्वेद की आड़ में अपने विशाल नेटवर्क के लिए घरेलू सामग्री बनवाने का काम शुरू कर दिया।

वे खुद तो व्यापारी या उद्योगपति नहीं थे किंतु उनके योग के नेटवर्क से बड़े निर्माताओं से संपर्क साधकर तमाम घरेलू उत्पाद वो भी धड़ाधड़ एक के बाद एक पतंजलि के बैनर तले बेचने लगे।

*(इतने ज्यादा और इतनी जल्दी तो स्थापित मान्य उद्योगपति भी उत्पाद नहीं निकाल पाते हैं।रिसर्च व डेवलपमेंट में काफी समय लगता है।)*

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*अब क्या था।लोग रामदेव जी की पूजा करते थे।इसलिए बिना दिमाग लगाए स्वदेशी के नाम पर अंधभक्तों की तरह पतंजलि के उत्पाद खरीदकर इस्तेमाल करने लगे।बाबा जी पलक झपकते एक बड़ी स्वदेशी कंपनी “पतंजलि” के मालिक बन गए।

*(भक्तों के जागने से पहले ही बाबा चोटी पर पहुंच गए।भक्त आज भी वहीं हैं जहां थे)*

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*अब बाबा जी का स्वभाव बदलने लगा।दूसरों को छोटा समझने लगे,जो मुंह में आता बोलने लगे।अहंकारी हो गए बाबा जी।सच कहो तो कल के योग गुरु बाबा रामदेव वर्तमान के सर्वश्रेष्ठ बिज़नेस गुरु बन… लाला रामदेव कहाने लगे।अब वापस योग गुरु व बाबा या स्वामी जैसी गौरवमयी उपाधियों को भी नज़रंदाज़ करने लगे।अमर्यादित हो चले।

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*अब बाबा की खाल मोटी हो चुकी थी।वे अपने भूतकाल को भूलकर एक बड़ी भूल कर बैठे।ऐसा प्रतीत होता है।अब तो वे समाज के प्रति अपने एहसानों को गिनाने व विज्ञापन करने का कोई भी मौका चाहे TV चैनल की डिबेट हो,में भी नहीं चूकते। “कोरोनिल” का डब्बा व “डेथ बाय प्रेस्क्रिप्शन” वाली किताब शायद अपने सिरहाने रख के सोते होंगे।वे कहीं भी जाएं ये दो चीज़ें साथ के जाना कभी नहीं भूलते।शायद किसी बड़े प्रोजेक्ट की रणनीति हो सकती है।

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*अब बाबा 98% जनता के इलाज के श्रेय खुद लेने लगे।व्यायाम व फ़ूड सप्पलीमेंट्स जो स्वस्थ व्यक्तियों व छोटी मोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए लाभदायक होती हैं ताकि आदमी बीमार न पड़े,उसे बीमारी का शर्तिया इलाज बताकर गंभीर असाध्य बीमारियों के इलाज करने वाला झोलाछाप बिना डिग्री वाला डिवाइन आयुर्वेदिक डॉक्टर बन गए।डिग्री धारक आयुर्वेदाचार्य भी उनसे ज्ञान प्राप्त करने लगे।यहां से आयुर्वेद की प्रगति रुक गयी या धीमी गति से होने लगी।

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*IMA से विवाद के उपरांत उन्होंने आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज खोलने के बजाय MBBS के लिए विश्वस्तरीय एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा एक नए विवाद को जन्म देती है।

पतंजलि के टर्नओवर को आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की बजाय एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज शायद ज्यादा और जल्दी बढ़ा सके।शायद……?????

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सभी क्वालिफाइड…….

*एलोपैथिक

*आयुर्वेदिक

*होम्योपैथिक

*यूनानी

*अन्य आयुष पद्धति के चिकित्सक जरा सोचिए।

*प्रत्येक चिकित्सा पद्धति के समान सम्मान के लिए समस्त मान्यता प्राप्त चिकित्सक समुदाय को एकजुट होना आवश्यक या अनावश्यक….*

*(आत्म मंथन करना जरूरी)*

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