ये भेदभाव क्यों ?
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जिस तरह बालासोर दुखन्तिका का कारण कोई आकस्मिक दुर्घटना,मानवीय भूल, कोई षड्यंत्र या फिर कोई तकनीकी ख़ामी कुछ भी हो सकता उसी तरह अस्पतालों में मृत्यु का कारण भी दुर्घटना,मानवीय भूल अथवा तकनीकी ख़ामी हो सकता है।हाँ अस्पताल में मृत्यु का कारण षड्यंत्र हो ऐसा कभी देखा नहीं गया।
128 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से दौड़ रही ट्रेन के चालक के पास कोई आकस्मिक निर्णय लेने के लिए जिस तरह मात्र कुछ सेकंड्स का समय होता है उसी तरह ऑपरेशन के दौरान निश्चेतना रोग विशेषज्ञ के पास भी मात्र कुछ सेकंड का ही समय होता है।जैसे ट्रेन के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलिंग सिस्टम में बेहद सतर्कता के बावजूद भी अचानक कोई तकनीकी ख़ामी आ सकती है है उसी तरह अस्पतालों में प्रयोग की जाने वाले बेहद जटिल उपकरणों में भी अचानक कोई तकनीकी ख़ामी आ सकती है।जैसे ट्रेन के संचालक दल से कोई मानवीय भूल हो सकती है उसी तरह अस्पताल में काम कर रहे किसी स्वास्थ्य कर्मी से भी कोई मानवीय भूल हो सकती हैं।
लेकिन इन सबके अतिरिक्त कुछ तथ्य हैं जो अस्पतालों में होने वाली दुर्घटना को ट्रेन दुर्घटना से अलग बनाते हैं। अस्पतालों में आने वाले लोग पहले से ही अस्वस्थ होते हैं न कि ट्रेन में यात्रा कर रहे यात्री की भाँति पूर्णतः स्वस्थ। कभी – कभी ऐसा भी होता है कि एक ही दवा जो एक व्यक्ति की जान बचाती है किसी अन्य व्यक्ति की एडवर्स इफ़ेक्ट के कारण जान ले भी सकती है।अस्पतालों में होने वाली दुर्घटनाओं में contributory नेग्लिजेंस की संभावना भी अधिक होती है जैसे – समय पर इलाज न लेना, डॉक्टर के बताये अनुसार इलाज न लेना,प्रशिक्षित चिकित्सक से इलाज न लेकर किसी झोलाछाप से इलाज लेना इत्यादि।भारत में दवाओं की गुणवत्ता पर भी आँख मूँद कर भरोसा नहीं किया जा सकता।हर दूसरे दिन औषधि विभाग कुछ दवाओं को प्रतिबंधित करता है।प्रतिबंध से पहले ये दवाएँ न जाने कितने मरीज़ों को नुक़सान पहुँचा चुकी होती हैं। भारत में नक़ली दवाओं का कारोबार भी कम नहीं है और इन दवाओं के कारण होने वाली हानि का लांछन भी अंततः चिकित्सकों व अस्पतालों पर ही थोप दिया जाता है।
यदि किसी सामान्य बुद्धि के न्यायप्रिय व्यक्ति से कहा जाये कि इन सभी तथ्यों की रोशनी में रेल दुर्घटना एवं मेडिकल दुर्घटना में होने वाली जनहानि के एवज़ में दिए जाने वाले मुआवज़े की राशि का निर्धारण करे तो मुझे विश्वास है वो राशि मेडिकल दुर्घटना के केस में रेल दुर्घटना से अधिक नहीं होगी।विडंबना है कि भारत में इसका उलट देखने को मिल रहा है।रेल दुर्घटना के मामलों में ये राशि 5-10 लाख होती है जबकि मेडिकल दुर्घटना के मामलों में करोड़ों में।पिछले दिनों ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन टेबल से गिरने के कारण मरीज़ की दुखद मृत्यु के आरोप में एक अस्पताल पर डेढ़ करोड़ का जुर्माना लगाया गया।मेरा प्रश्न है कि बालासोर दुर्घटना के मृतकों को भी सरकार डेढ़ -डेढ़ करोड़ रुपया देगी ? दूसरा प्रश्न ये है कि क्या ट्रेन दुर्घटना या ऐसे किसी अन्य हादसे में हुई मृत्यु के मामलों में मुआवज़ा देते समय मृतक की आमदनी के अनुसार मुआवज़ा तय किया जाता है ? ऐसा नहीं होता और होना भी नहीं चाहिए मगर आश्चर्य कि उपभोक्ता अदालतें मेडिकल नेग्लिजेंस के केस में जुर्माने की राशि का निर्धारण मृतक की आमदनी के अनुसार करती हैं जबकि सभी अस्पताल अपने सभी मरीज़ों से एक जैसी फ़ीस लेते हैं।
मेडिकल एसोसिएशन्स को अब इस विषय पर मौन नहीं रहना चाहिए।अन्याय को इस हद तक सहन करना कायरता का प्रतीक है।
बालासोर ट्रेन दुर्घटना में जान गँवाने वाले सभी निर्दोष नागरिकों को विनम्र श्रद्धांजलि ।🙏🙏
~डॉ राज शेखर यादव
फ़िजिशयन,ब्लॉगर










