सफ़ेद कोट की जेब में रखी ज़िंदगी
मेडिकल कॉलेज के दिनों में लगता था,
बस रेज़िडेंसी मिल जाए,
तो ज़िंदगी मुकम्मल हो जाएगी।
रेज़िडेंसी में लगा,
एक विशेषज्ञ बन जाऊँ,
तो शायद सुकून मिल जाए।
फिर लगा,
नाम हो,
पहचान हो,
मरीज़ों की लंबी कतार हो,
सम्मेलनों के मंच हों,
किताबों में मेरा नाम छपे,
तो शायद मन ठहर जाए।
मगर अजीब बात है—
हर मंज़िल के आगे
एक और रास्ता खड़ा मिला।
हर उपलब्धि के बाद
एक नया सपना दस्तक देता रहा।
और मैं…
सफ़ेद कोट की जेब में
कुछ अधूरे मौसम लिए
भागता रहा।
बहुत बाद में समझ आया—
दवा की दुनिया में
कोई आख़िरी पड़ाव नहीं होता।
यहाँ कोई ऐसा मेडल नहीं
जो सारी बेचैनियाँ उतार दे।
कोई ऐसी कुर्सी नहीं
जिस पर बैठकर मन कहे—
“अब पहुँच गया हूँ।”
अगर आज
अपने युवा दिनों वाले ख़ुद से मिलूँ,
तो बस इतना कहूँगा—
ज़रा ठहरो।
तुम रास्ता नहीं,
रास्ते के फूल छोड़ते जा रहे हो।
वो मरीज़ याद है,
जिसने नम आँखों से
हाथ जोड़कर सिर्फ़ इतना कहा था—
“डॉक्टर साहब, आपने उम्मीद लौटा दी।”
वो माँ याद है,
जिसकी मुस्कान में
दुनिया भर की राहत थी।
वो छात्र,
जो अपने सवालों से घबराता हुआ आया था,
और भरोसा लेकर लौटा।
वो रेज़िडेंट,
जिसका फ़ोन बरसों बाद आया—
“सर, आपकी एक बात आज भी याद है।”
वो लंबी ड्यूटियाँ,
जो ख़त्म नहीं होती थीं,
मगर दोस्तियाँ उम्र भर की दे जाती थीं।
वो वार्ड राउंड,
जहाँ थकान के बीच भी
हँसी अपना रास्ता ढूँढ लेती थी।
वो मुश्किल केस,
जो रात भर जगाए रखते थे।
और फिर,
सुबह किसी चमत्कार की तरह
मरीज़ का सँभल जाना।
इमरजेंसी की भागदौड़ के बाद
चुपचाप पी गई
चाय की वो प्याली…
किसी परिजन का
कृतज्ञता से झुकता सिर…
किसी काँपते हाथ को
थाम लेने का सौभाग्य…
ये सब सफ़र से भटकाने वाली चीज़ें नहीं थीं।
यही तो सफ़र था।
डिग्रियाँ धूल ओढ़ लेती हैं।
पुरस्कार अलमारियों में सो जाते हैं।
शोध-पत्र
बायोडाटा की गिनती बन जाते हैं।
लेकिन बरसों बाद भी
कुछ चेहरे धुँधले नहीं पड़ते।
कुछ आवाज़ें
दिल के गलियारों में गूँजती रहती हैं।
कुछ लोग
अपना थोड़ा-सा हिस्सा
आपके भीतर छोड़ जाते हैं।
और आप भी,
अपना थोड़ा-सा हिस्सा
उनके साथ भेज देते हैं—
आने वाले कल की ओर।
एक दिन,
जब सफ़ेद कोट
आख़िरी बार टाँग दिया जाएगा,
तब याद नहीं आएगा
कि कितने पुरस्कार मिले थे।
याद आएँगे—
वे लोग,
जो आपकी ज़िंदगी से गुज़रे थे।
और तब समझ आएगा,
कामयाबी
एक बड़ा डॉक्टर बनने में नहीं थी।
कामयाबी तो उन हज़ारों छोटे पलों में थी,
जब आपने किसी का दर्द हल्का किया,
किसी का डर बाँटा,
किसी को उम्मीद दी।
क्या ख़ूबसूरत बात है—
कि मरीज़
कभी सिर्फ़ आपके पेशे का हिस्सा नहीं थे।
वे तो
आपकी पूरी कहानी थे।










