2024 ratings for India: profession-wise comparison
The following percentages show the share of respondents who regarded each profession as trustworthy.
Profession / group Rated trustworthy
Doctors 57%
Armed forces personnel 56%
Teachers 56
Scientists 54%
Judges 52%
Bankers 50%
Police 47%
Government employees / civil servants 46%
Business leaders 44%
Lawyers 43%
Journalists 43%
Politicians generally 31%
Government ministers 28%
Clergy / priests 27%
These figures are trustworthiness ratings, not a direct examination of honesty or character. A respondent could consider someone trustworthy without necessarily believing that the person is selfless or willing to sacrifice personal interests for public service.
दोस्तों हम भी कहीं न कहीं खुद पर से भी अपना विश्वास खत्म करते जा रहे हैं और हमने मान लिया है कि सारी जनता ही हमारे खिलाफ है , पर हकीकत यह है कि अभी भी आम आदमी हमारे प्रोफेशन को भारतीय सेना से भी ऊपर विश्वास लायक मानते हैं जहां 57% प्रतिशत लोग डाक्टर पर विश्वास जता रहे हैं
हमारी सेना , टीचर ,साइंटिस्ट , जज, बैंकर 56%-50%) बीच आते हैं
जर्नलिस्ट , पॉलिटीशियन , मंत्री , तमाम बाबा चर्च के इसी चरित्र के लोग सबसे कम विश्वास लायक हैं
अतः अपने को आप को खत्म हो चुके मानने की जरूरत नहीं , अभिनेता की विश्वसनीयता उसकी फेन फॉलो की संख्या से नहीं मापी जा सकती , उनके लिए जनता के विश्वास सबसे कम है , उनको वो मानते गैर ये जरूरी ही हैं
हम क्यों फिर परेशान हैं
बुनियादी बातें यह हैं कि हम अपने अधिकारों के लिए संयुक्त रूप से आगे आना छोड़ चुके हैं ,
हम प्रदर्शन से परहेज कर चुके हैं , आज का हिंदुस्तान सड़क से चल रहा है हमको भी सड़क पर आना पड़ेगा , हमको पहले बहुत मेहनत करके ईमानदारी से इलाज भी करना होगा और उसे शौर्य में बदलने के लिए जब भी जरूरत हो तो संगठित आक्रामक विरोध करना होगा , हड़ताल यदि जरूरी हो जाए तो वह अपवाद में नहीं रखी जाए बल्कि वह ज्यादातर की जाएं , सड़क पर बिल्कुल अहिंसक और गरिमा में शांत प्रदर्शन बहुत जरूरी है , सम्मान की रक्षा में , हमको अपना कमाई एक हिस्सा , लीगल लड़ाइयों पर लगाना होगा , एक एक करोड़ की कॉन्फ्रेंस करने की जगह , जिसमें हम एक दूसरे पर रुआब ग़ालिब करते है उससे अच्छा है , एक करोड़ की फीस वाला सुप्रीम कोर्ट का वकील ले लो वो सूर्या जैसी थर्ड क्लास , दिमागी दिवालियापन की फिल्म के स्क्रीनिंग पर स्टे ले आयगा , यदि हम मंत्री को चिठ्ठी लिखेंगे तो हम जानते हैं, जनता ही उनपर रत्ती भर भरोसा नहीं करती जैसा ऊपर की लिस्ट में देख सकते है , वो क्या करेंगे , सेंट्रल बोर्ड जो फिल्म को देखकर सर्टिफिकेट देते है वो कही ज्यादा प्रभावकारी है यदि हमारी सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन उन्हें लिखें , सोशल मीडिया से टीजर को हटवाने के लिए इसे फेस बुक इंस्टा और यू ट्यूब पर रिपोर्ट करें कि यह मूवी एक मरीज के मन शंका भरकर पूरे मेडिकल सिस्टम को ध्वस्त करने के लिए कूट सूचना देने वाली मूवी है , अपने को संगठित तो रहना ही उसके साथ थोड़ा उग्र भी रहना है, डाक्टर एकता जिंदाबाद ,
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हों तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है।”










