आयुर्वेद की धरती से राजभवन तक
एक चिकित्सक, जनसेवक और उत्तराखण्ड के नवनियुक्त राज्यपाल की प्रेरक यात्रा
जब चिकित्सा का अनुभव जनसेवा की भावना से मिलता है, तो एक व्यक्ति का जीवन समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
1. मध्य प्रदेश के एक गाँव से शुरू हुई कहानी
भारत के गाँवों में अनेक ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं, जिनके नायक किसी बड़े मंच या भव्य भवन में नहीं, बल्कि साधारण परिवेश में अपनी यात्रा आरम्भ करते हैं। डॉ. ढाल सिंह बिसेन की जीवन-यात्रा भी ऐसी ही एक कहानी है।
डॉ. बिसेन का जन्म 14 मई 1952 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के पिपरिया गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। ग्रामीण जीवन की सादगी, खेती-किसानी से जुड़ी कठिनाइयाँ और आम लोगों की आवश्यकताओं को निकट से देखने का अवसर उन्हें मिला। किसान परिवार में जन्म लेने का अर्थ केवल खेतों की मिट्टी से जुड़ना नहीं, बल्कि परिश्रम, धैर्य और परिस्थितियों से संघर्ष करना भी है।
गाँव का जीवन मनुष्य को अनेक पाठ पढ़ाता है। वहाँ किसी के घर में बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार चिंतित हो उठता है। इलाज की सुविधा दूर हो, आर्थिक स्थिति कमजोर हो और बीमारी गंभीर हो, तो संकट और बढ़ जाता है।
ऐसे वातावरण में पले-बढ़े व्यक्ति के सामने जीवन के आरम्भिक वर्षों में ही यह प्रश्न आ सकता है कि वह समाज के लिए क्या कर सकता है।
डॉ. बिसेन ने चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने का मार्ग चुना। यही उनके जीवन का वह अध्याय था, जिसने आगे चलकर उन्हें एक अलग पहचान दी।
2. चिकित्सा की शिक्षा और सेवा का रास्ता
डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने रायपुर स्थित आयुर्वेदिक महाविद्यालय से आयुर्वेद तथा चिकित्सा से संबंधित शिक्षा प्राप्त की। उपलब्ध समाचार विवरणों में उनकी आयुर्वेद विज्ञानाचार्य की डिग्री का उल्लेख मिलता है। वे आयुर्वेद और होम्योपैथी चिकित्सा से जुड़े चिकित्सक रहे हैं।
चिकित्सक बनना केवल एक उपाधि प्राप्त करना नहीं है। यह उस विश्वास को स्वीकार करना है, जिसके साथ एक रोगी अपनी पीड़ा लेकर आपके सामने बैठता है।
कल्पना कीजिए कि किसी ग्रामीण परिवार का सदस्य चिकित्सक के सामने बैठा है। उसके चेहरे पर चिंता है और मन में अनेक प्रश्न।
“डॉक्टर साहब, बीमारी ठीक हो जाएगी न?”
चिकित्सक का उत्तर केवल दवाइयों का नाम नहीं होता। रोगी को सही सलाह देना, उसकी बात ध्यान से सुनना और उसके भीतर आशा जगाना भी चिकित्सा का हिस्सा है।
यह संवाद डॉ. बिसेन के जीवन की किसी प्रमाणित घटना का वर्णन नहीं, बल्कि उस मानवीय जिम्मेदारी का प्रतीक है जो हर चिकित्सक के पेशे से जुड़ी होती है।
चिकित्सा का अनुभव मनुष्य को समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराता है। वह समझता है कि बीमारी केवल शरीर को प्रभावित नहीं करती; उसका असर परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की पढ़ाई और पूरे घर की दिनचर्या पर पड़ सकता है।
एक चिकित्सक जब समाज को इस दृष्टि से देखता है, तो उसके सामने सेवा के अनेक रास्ते खुलते हैं।
3. चिकित्सा से राजनीति तक
डॉ. बिसेन के जीवन का अगला महत्वपूर्ण अध्याय राजनीति है।
उनकी पहचान केवल चिकित्सक तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बनाई। वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे हैं। उन्हें मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए चार बार चुने जाने और वर्ष 2019 में बालाघाट लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित होने का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
चिकित्सा और राजनीति के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों में एक महत्वपूर्ण समानता है—लोगों की समस्याओं को समझना और उनके समाधान का प्रयास करना।
चिकित्सक के सामने सामान्यतः एक रोगी या एक परिवार होता है। जनप्रतिनिधि के सामने पूरा क्षेत्र होता है। वहाँ सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और सामाजिक विकास जैसे अनेक प्रश्न एक साथ उपस्थित रहते हैं।
कल्पित संवाद में इस परिवर्तन को इस प्रकार समझा जा सकता है:
“डॉक्टर साहब, पहले आप रोगी की परेशानी सुनते थे। अब आप पूरे क्षेत्र की समस्याएँ सुनते हैं। क्या दोनों कामों में कोई समानता है?”
इस प्रश्न का एक विचारात्मक उत्तर हो सकता है:
“समस्या को ध्यान से सुनना और उसके समाधान के लिए ईमानदारी से प्रयास करना—दोनों जगह यही सबसे जरूरी है।”
यहाँ प्रस्तुत संवाद रचनात्मक है, डॉ. बिसेन का वास्तविक उद्धरण नहीं।
राजनीतिक जीवन में सफलता केवल चुनाव जीतने से नहीं मापी जाती। जनता की अपेक्षाओं को समझना, विभिन्न परिस्थितियों में निर्णय लेना और सार्वजनिक उत्तरदायित्व निभाना भी इसका हिस्सा है। डॉ. बिसेन का विधायक, मंत्री और सांसद के रूप में अनुभव उनके सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
4. एक नया अध्याय: देवभूमि उत्तराखण्ड का राज्यपाल
12 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखण्ड का राज्यपाल नियुक्त किया। यह नियुक्ति उनके सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण नया पड़ाव है। संदर्भ: राष्ट्रपति भवन की प्रेस विज्ञप्ति।
उत्तराखण्ड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि हिमालय की गोद में बसा ऐसा प्रदेश है जिसकी पहचान आध्यात्मिक परम्पराओं, प्राकृतिक सम्पदा, लोकसंस्कृति और जैव विविधता से जुड़ी है। यहाँ गंगा और यमुना के उद्गम क्षेत्र हैं, केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे प्रसिद्ध तीर्थ हैं, योग और ध्यान की समृद्ध परम्परा है तथा वनौषधियों और पारम्परिक ज्ञान का महत्वपूर्ण संसार है।
ऐसे राज्य में एक ऐसे व्यक्ति का आगमन, जिसकी पृष्ठभूमि चिकित्सा से जुड़ी रही हो, आयुर्वेद और जनस्वास्थ्य पर सार्थक संवाद के लिए एक अवसर प्रस्तुत करता है।
कल्पना कीजिए कि राजभवन में किसी परिचर्चा के दौरान एक युवा आयुर्वेद विद्यार्थी प्रश्न करता है:
“माननीय राज्यपाल महोदय, क्या आधुनिक समय में आयुर्वेद और पारम्परिक चिकित्सा को नई पहचान मिल सकती है?”
इस प्रश्न का आदर्श उत्तर केवल परम्परा की प्रशंसा नहीं होगा। वह शोध, प्रमाण, शिक्षा, गुणवत्ता और जनहित को साथ लेकर चलने की आवश्यकता पर बल देगा।
आयुर्वेद का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब प्राचीन ज्ञान का सम्मान वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ किया जाएगा। औषधीय पौधों का संरक्षण, उनकी सही पहचान, सुरक्षित उपयोग, गुणवत्तापूर्ण औषधियों का निर्माण और उनके प्रभावों का प्रमाण-आधारित मूल्यांकन आवश्यक हैं।
यह संवाद भी कल्पित है। इसका उद्देश्य उस संभावना को रेखांकित करना है जो चिकित्सा पृष्ठभूमि वाले राज्यपाल की नियुक्ति से सार्वजनिक विमर्श में उभर सकती है।
5. आयुर्वेद, योग और वनौषधियों की सम्भावनाएँ
उत्तराखण्ड में आयुर्वेद और योग की चर्चा स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य, पर्यटन, शिक्षा, स्थानीय आजीविका और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ जाती है।
पहाड़ों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ केवल औषधीय उपयोग की सम्भावना नहीं रखतीं; वे स्थानीय समुदायों के पारम्परिक ज्ञान और प्राकृतिक विरासत का हिस्सा भी हैं।
लेकिन इस सम्पदा का संरक्षण अत्यन्त सावधानी से किया जाना चाहिए। औषधीय पौधों का अनियंत्रित दोहन जैव विविधता को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए संरक्षण, वैज्ञानिक खेती, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सतत उपयोग को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
योग के क्षेत्र में भी उत्तराखण्ड के पास विश्वस्तरीय पहचान विकसित करने की व्यापक सम्भावनाएँ हैं। योग को केवल पर्यटन या प्रदर्शन तक सीमित रखने के बजाय उसके सही प्रशिक्षण, शोध, जीवनशैली संबंधी शिक्षा और जनस्वास्थ्य में उपयोग पर ध्यान दिया जा सकता है।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य, योग, आयुष और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े प्रयासों को आगे बढ़ाने में राज्यपाल का संवैधानिक पद संवाद और मार्गदर्शन का अवसर प्रदान कर सकता है। राज्यपाल सरकार के दैनिक प्रशासन का संचालन नहीं करते, लेकिन वे संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर विश्वविद्यालयों, संस्थानों और सार्वजनिक हित के विषयों से जुड़े महत्वपूर्ण विमर्श में भूमिका निभा सकते हैं।
एक आदर्श दृश्य की कल्पना कीजिए। किसी विश्वविद्यालय में आयुष पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक विद्यार्थी पूछता है:
“हमारे पहाड़ों में इतनी वनौषधियाँ हैं। क्या हमारे युवा इनके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन को अपना करियर बना सकते हैं?”
यह प्रश्न केवल एक विद्यार्थी का नहीं, बल्कि उन अनेक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी शिक्षा और अपने प्रदेश की प्राकृतिक सम्पदा के बीच एक सार्थक संबंध स्थापित करना चाहते हैं।
यदि शोध संस्थान, विश्वविद्यालय, आयुष विशेषज्ञ, वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर काम करें, तो औषधीय पौधों का संरक्षण ग्रामीण आजीविका तथा वैज्ञानिक अध्ययन के नए अवसर पैदा कर सकता है।
डॉ. बिसेन की नियुक्ति इस दिशा में सकारात्मक संवाद की सम्भावना अवश्य पैदा करती है। हालांकि इन क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति संस्थागत सहयोग, नीतिगत निर्णयों, पर्याप्त संसाधनों और ठोस कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।
6. एक चिकित्सक की दृष्टि और एक राज्यपाल की जिम्मेदारी
चिकित्सक का प्रशिक्षण उसे मनुष्य की पीड़ा को समझने का अवसर देता है। लेकिन राज्यपाल की भूमिका इससे अलग और व्यापक संवैधानिक जिम्मेदारियों से निर्धारित होती है।
राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। उनके दायित्वों में संविधान के अनुसार कार्य करना, निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत विधेयकों और अन्य मामलों पर विचार करना तथा विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करना शामिल हो सकता है।
इसलिए डॉ. बिसेन की चिकित्सा पृष्ठभूमि को उनकी व्यक्तिगत विशेषता के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि इस आधार पर यह मान लेना चाहिए कि वे सीधे राज्य की स्वास्थ्य नीतियों का संचालन करेंगे।
फिर भी उनकी पृष्ठभूमि आयुर्वेद, पारम्परिक चिकित्सा और जनस्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर संवेदनशीलता तथा सार्थक चर्चा के लिए एक विशिष्ट आधार प्रदान कर सकती है।
किसी भी संवैधानिक पद की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके अधिकारों के साथ-साथ उसकी मर्यादाओं के सम्मान में निहित होती है।
7. आयुर्वेद जगत के लिए गौरव का क्षण
एक आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में मैं इस नियुक्ति को एक विशेष दृष्टि से देखता हूँ।
चिकित्सा जगत में विभिन्न पद्धतियों के चिकित्सक अपने-अपने क्षेत्र में समाज की सेवा करते हैं। जब किसी चिकित्सा पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को उच्च संवैधानिक पद पर नियुक्त किया जाता है, तो उस पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों में स्वाभाविक प्रसन्नता उत्पन्न होती है।
आयुर्वेद की परम्परा सदियों पुरानी है। इसकी वास्तविक शक्ति केवल इसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति समग्र दृष्टिकोण, जीवनशैली संबंधी ज्ञान और निरन्तर अनुसंधान की सम्भावनाओं में है।
आज आवश्यकता है कि आयुर्वेद को न तो केवल अतीत की गौरवगाथा बनाकर छोड़ दिया जाए और न ही बिना पर्याप्त प्रमाण के प्रत्येक पारम्परिक दावे को वैज्ञानिक सत्य मान लिया जाए। इसकी शिक्षा, अनुसंधान, औषधि निर्माण और चिकित्सकीय उपयोग में गुणवत्ता तथा सुरक्षा के मानकों को मजबूत करना आवश्यक है।
डॉ. बिसेन की नियुक्ति आयुर्वेद जगत के लिए यह अवसर भी बन सकती है कि वह अपने अनुभव, ज्ञान और भविष्य की अपेक्षाओं को अधिक प्रभावी ढंग से सार्वजनिक विमर्श में रखे।
8. देवभूमि से अपेक्षाएँ
उत्तराखण्ड के नागरिकों की अपेक्षाएँ स्वाभाविक रूप से अनेक होंगी—पहाड़ों से पलायन कम हो, युवाओं को रोजगार मिले, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत हों, पर्यावरण सुरक्षित रहे और प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान समृद्ध हो।
इन अपेक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी अनेक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है। राज्यपाल की भूमिका इस संवैधानिक व्यवस्था के भीतर अपनी विशिष्ट जगह रखती है।
डॉ. बिसेन के सामने एक नए प्रदेश, उसकी भौगोलिक चुनौतियों, सांस्कृतिक विविधता और जनआकांक्षाओं को समझने का अवसर होगा। मध्य प्रदेश में उनके दीर्घ सार्वजनिक अनुभव से उन्हें शासन और जनजीवन के अनेक पहलुओं की समझ प्राप्त हुई होगी; उत्तराखण्ड की विशिष्ट परिस्थितियों को समझना इस नए अध्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
किसी भी नियुक्ति का मूल्यांकन केवल उसके आरम्भिक उत्साह से नहीं, बल्कि समय के साथ उसके कार्यकाल की उपलब्धियों, संवैधानिक मर्यादा और सार्वजनिक योगदान के आधार पर किया जाता है।
9. शुभकामनाओं के साथ
डॉ. ढाल सिंह बिसेन की यात्रा चिकित्सा शिक्षा से सार्वजनिक जीवन और अब उत्तराखण्ड के राज्यपाल पद तक पहुँची है। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
उनकी नियुक्ति पर आयुर्वेद जगत में प्रसन्नता व्यक्त करना स्वाभाविक है। साथ ही, यह आशा भी की जा सकती है कि उनके अनुभव और सार्वजनिक जीवन की समझ से प्रदेश में आयुर्वेद, योग, औषधीय पौधों के संरक्षण तथा पारम्परिक ज्ञान पर सकारात्मक और प्रमाण-आधारित विमर्श को प्रोत्साहन मिले।
एक चिकित्सक के रूप में मेरी शुभकामना है कि डॉ. बिसेन अपने नए दायित्व का निर्वहन संविधान की मर्यादा, निष्पक्षता और जनहित की भावना के अनुरूप करें।
देवभूमि उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सम्पदा सुरक्षित रहे, उसकी सांस्कृतिक विरासत समृद्ध हो, उसके युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलें और स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच तथा मानवीय संवेदना साथ-साथ आगे बढ़ें।
आयुर्वेद जगत की ओर से डॉ. ढाल सिंह बिसेन जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
ईश्वर उन्हें स्वस्थ जीवन, विवेकपूर्ण निर्णयों और जनहित में सार्थक योगदान की शक्ति प्रदान करे। उनके कार्यकाल में उत्तराखण्ड की संवैधानिक परम्पराएँ मजबूत हों और प्रदेश की प्रगति में सभी संस्थाओं का सहयोग बढ़े।
देवभूमि उत्तराखण्ड के नवनियुक्त राज्यपाल को एक बार फिर हार्दिक अभिनन्दन।
— एक चिकित्सक की ओर से, आयुर्वेद और जनसेवा के प्रति सम्मान सहित।
तथ्य-जाँच के लिए स्रोत: डॉ. बिसेन की नियुक्ति की पुष्टि राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में है। उनकी जन्मतिथि, शैक्षिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक यात्रा का विवरण समाचार रिपोर्टों पर आधारित है।










