सरकारी डॉक्टर बाबू

.डी एम साहब /सी एम ओ साहिब

पी एम एस के एक नौजवान डाक्टर द्वारा भेजी,

क्या निम्नलिखित पोस्ट भी सही है?

पीएचसी-सीएचसी और एडिशनल पीएचसी पर डॉक्टर क्यों नहीं जाना चाहते,कम तनख़्वाह अलग चीज़ है,वेतन तो कम है ही,सबसे बड़ी वजह है राजनीतिक हस्तक्षेप, अनपढ / कम पढे लिखे प्रधान/ ब्लाक प्रमुख की सुनिए,मंत्री/विधायक की सुनिए उनके चमचो की सुनिए ,ग़लत मेडिको लीगल करने के लिए दबाव झेलिए,गुस्साई भीड़ को संभालिए,प्रशासनिक काम कीजिए,एक दिन अस्पताल में बैठिए तो दूसरे दिन ऑफ़िस में,तहसील का बीए पास डिप्टी कलेक्टर भी चेकिंग करने आ जा रहा है और रोब जमा रहा है.मछली विभाग और क्रीड़ा विभाग के अफ़सरों को भी डीएम नोडल अफ़सर बनाकर पीएचसी चेक करने भेज दे रहे हैं,सीएमओ तो विभाग के अफ़सर हैं,उनकी सुनना तो ठीक है,लेकिन डीडीओ और सीडीओ भी हुक्म सुना रहे हैं. इन सबके लिये कोई प्रोटोकॉल डाक्टरों के प्रति नही होता हैं क्या?। खुद डाक्टर न बन पाने का मलाल इन सबके चेहरे पर साफ दिखता हैं। नसबंदी का टार्गेट पूरा करो,कुत्ता काटे और सांप काटे लोगों की नाराज़गी झेलो अगर सरकार ने वैक्सीन/ दवाएं नहीं भेजी.पीएचसी पर रहो तो सबसेंटर चेक करो,मिडवाईफ़ और हेल्थ विज़िटर आशा अलग नेतागिरी करवाती हैं,रात में मारपीट का केस आए तो लालटेन जलाकर मुआयना करो,जनरेटर के तेल का बजट अटका रहता है,जनरेटर ख़राब है तो बनता नहीं,मेडिको लीगल का कोर्ट में बयान देने जाओ,आज जाओ और तीस साल बाद भी जाओ,केस जबतक चलता रहे जाते रहो.वीआईपी मूवमेंट में मुस्तैद रहो,सरकारी गाड़ी के डीज़ल के लिए बजट नहीं आता,जेब से तेल भरवाओ,सरकार नाम का एनपीए देती है और दो-दो कौड़ी के चोर भी डॉक्टर की प्राइवेट प्रैक्टिस पर नज़र रखते हैं,बार-बार सरकार कहती है कि चिकित्सकीय अभ्यास मना है तो हम अपनी विद्या कहा खर्च करें .ज़िले पर मीटिंग में जाओ,तहसील दिवस पर जाओ,अलग-अलग अभियान के लिए अलग-अलग मीटिंग होती है,वहाँ भी जाओ.ऊपर से बिना बिजली-पानी के कई-कई दिन पीएचसी पर रहो,संसाधन के अभाव में ऑपरेशन भी करो,नसबंदी करो,बगल की पीएचसी का चार्ज मिल गया तो वहाँ भी जाओ,वजह कि वहाँ डॉक्टर नहीं हैं.माहामारी फैली तो कम संसाधन में संभालो,बाढ़ आई तो बाढ़ चौकी पर रहे.चुनाव में ड्यूटी करो और दिनभर में सैकड़ों मरीज़ देखो.आज के नए डॉक्टर ये सब झेल नहीं पाते,डॉक्टर लक्ज़री लाइफ़ पसंद आदमी होता है, समाज के सबसे क्रीम छात्र ही डाक्टर बन पाता हैं। यह कोई बी ए पास छात्र नही जो साल भर बन्द कमरे मे समुद्र/ पहाड़ की गहराई/ उचाई रट कर भाग्य भरोसे प्रशासनिक अधिकारी बन जाता हैं। वह समाज के लिए जिसके शारिरिक मानसिक दुख को कोई भी नहीं समझता अपनी जवानी के 10-15 साल सिर्फ पढाई मे लग देता है उसे 2-3 परिक्षा ही नही लगभग २50 परिक्षाओं से गुजरना पड़ता है वह रिमोट एरिया में रात नहीं बिताना चाहता, पश्चिमी देशों की तूलना मे जहा 20-30 लाख महीने सेलरी है भारत मे तनख़्वाह भी सरकार कम देती है लगभग नमक के बराबर, तुलना त्मक रुप से भारत मे सरकारी डॉक्टर लगभग मुफ्त में काम कर रहे हैं और अब पेंशन भी नहीं देगी,तो कोई क्यों सरकारी नौकरी करे.डॉक्टर की नौकरी ही ऐसी नौकरी है जिसमें सीटें रिक्त रह जाती हैं,कुछ लोग ज्वाइन करने के बाद नौकरी पर जाते ही नहीं और इस्तीफ़ा दे देते हैं,जितनी तनख़्वाह सरकार देती है उतनी चले डॉक्टर एक दिन में शहर में कमाते हैं,सरकारी नौकरी कर डॉक्टर सरकार पर एहसान करता है,बाकी नौकरियों में सरकार का अहसान है कि उसने नौकरी दी,डॉक्टर इसीलिए अपने सम्मान पर आंच आने पर नौकरी को लात मार देता है.प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र,अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उच्चीकृत प्रा.स्वा.केंद्र पर इन्हीं सब वजहों से चिकित्सकों का टोटा रहता है.नए ज़माने के विशेषज्ञ चिकित्सक तो अब उधर झांकना भी पसंद नहीं करते,ये भी वजह कि फ़ीस और डोनेशन की मोटी रक़म ख़र्च कर ज़्यादातर लोग विशेषज्ञ बनते हैं,सरकार की नौकरी कर कब तक वसूल करेंगे. एक बात और जनता/ नेता/ मंत्री डाक्टर को जब ना तब मानव सेवा ही धर्म है का पाठ पढाते है तो यह भी जानकारी रखे कि अस्पताल में आने वाले मानव की सेवा धर्म है दानव की नहीं। और हा जिनको मिर्ची लगी हो घर मे एक आधे डाक्टर तैयार कर समाज सेवा अवश्य करा ले।

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